भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1396

[ 14/184-191 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला “राधा बसि' आछे किंवा वृन्दावने याय। ताँहा आचम्बिते कृष्ण-दरशन पाय॥185॥ देखितेइ नाना-भाव हय विलक्षण। से वैलक्षण्येर नाम 'विलास'-भूषण॥186॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने कहना आरम्भ किया, जिसे सुनकर महाप्रभुके भक्तोंको परमसुख प्राप्त हुआ। श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “श्रीराधा कभी कहीं बैठी हुई हैं अथवा वृन्दावनमें जा रही हैं—ऐसे समयमें यदि उन्हें अचानक श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त हो जाये, तो दर्शन करते ही उनमें अनेक प्रकारके विलक्षण भाव उदित हो जाते हैं, उन विलक्षण भावोंका नाम ही 'विलास'-भूषण है॥184-186॥ उज्जवलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (31 श्लोक) :- गतिस्थानासनादीनां मुखनेत्रादिकर्मणाम्। तात्कालिकं तु वैशिष्ट्यं विलासः प्रियसङ्गजम्॥187॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥187॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रियके सङ्गसे उत्पन्न, प्रिय सङ्गम-स्थानपर जाना और बैठना आदि एवं मुखनेत्रादि अङ्गोंका उस समय जो वैशिष्ट्य उदित होता है, उसे 'विलास' कहते हैं॥187॥ अनुभाष्य— गतिस्थानासनादीनां (कान्तायाः गमनावस्थानोपवेशनादिकानां) मुखनेत्रादिकर्मणां च (आङ्गिकक्रियाणां) प्रियसङ्गजं (कान्तसम्मिलनजातं) तात्कालिकं (कान्तमिलन-कालिकं) वैशिष्ट्यं (वैचित्र्यं) तु 'विलासः' [इत्यभिधीयते]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥187॥ लज्जा, हर्ष, अभिलाष, सम्भ्रम, वाम्य, भय। एत भाव मिलि' राधाय चञ्चल करय॥188॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अचानक दर्शन होनेसे श्रीराधाको लज्जा, हर्ष, अभिलाष, सम्भ्रम, वाम्य तथा भय—ये सब भाव मिलकर चञ्चल कर देते हैं॥188॥ गोविन्दलीलामृतमें (9/11 श्लोक) :- पुरः कृष्णलोकात् स्थगितकुटिलास्या गतिरभूत् तिरश्चीनं कृष्णाम्बरदरवृतं श्रीमुखमपि। चलत्तारं स्फारं नयनयुगमाभुग्नमिति सा विलासाख्य-स्वालङ्करणवलितासीत् प्रियमोदे॥189॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥189॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णको सामने देखकर राधिकाके गमनने स्थिर होकर कुटिल भाव धारण कर लिया; उनका मुखकमल नीले वस्त्रसे कुछ ढका होनेपर भी नेत्रोंकी दोनों पुतलियाँ विस्तृत, चञ्चल और वक्र हो गयीं एवं विलास नामक अलङ्कारसे मण्डित होकर वे श्रीकृष्णके आनन्दका वर्धन करने लगीं॥189॥ अनुभाष्य— अस्याः (श्रीराधायाः) गति पुरः (अग्रतः) कृष्णालोकात् (कृष्णदर्शनेन) स्थगितकुटिला (स्थगिता स्तब्धा कुटिला मन्दा च) अभूत्; श्रीमुखमपि तिरश्चीनं (वक्रीभूतं) कृष्णाम्बर-दरवृतं (श्यामवासेन ईषत् आवृतञ्च) अभूत्; चलत्तारं (चलन्ती तारा यत्र तत्) स्फारं (विस्तृतं) नयनयुगं (नेत्रद्वयम्) आभुग्नं (वक्रम) अभूत्; -इति सा राधा प्रियमुदे (कृष्णानन्दवर्द्धनाय) विलासाख्य-स्वालङ्करण-वलिता (विलासाभिधेयेन स्वेन निजेन अलङ्करणेन भूषणेन वलिता समन्विता) आसीत्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥189॥ कृष्ण-आगे राधा यदि रहे दाण्डञा। तिन-अङ्ग-भङ्गे रहे भ्रू नाचाञा॥190॥ मुखे-नेत्रे हय नाना-भावेर उद्गार। एइ कान्ता-भावेर नाम 'ललित'-अलङ्कार॥191॥ अनुवाद—यदि श्रीराधा श्रीकृष्णके सामने खड़ी रहें, तो वे त्रिभङ्ग रूपमें हो जाती हैं, उनकी भ्रुकुटि (भौंहें) नृत्य करने लगती है और उनके मुख तथा नेत्रोंमें अनेक प्रकारके भाव प्रकट होने लगते हैं। कान्ताके इस भावका नाम 'ललित'-अलङ्कार है॥190-191॥ अनुभाष्य—'तिन-अङ्ग-भङ्गे'-त्रिभङ्ग रूपमें; 'तिन 552 ।