श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1410, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ वन-ह्लादिनी श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत वनलतास्तरव आत्मनि 8/275 | श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी 6/254 | सा चैवास्मि तथापि 1/58, 13/121 वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य 1/2 | श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं 2/28 | सार्वभौमं सर्वभूमा भक्ति 6/1 वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण 8/58 | श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः 12/1 | सालोक्य-सार्ष्टि 6/270, 9/268 विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रीगोपालः प्रादुरासीद्वशः 4/1 | सिक्तायां कृष्णलीलामृतरस 8/210 वह्निः सीतां समानीय 9/212 | श्रीमान्रासरसारम्भी वंशी 1/5 | सिद्धान्तस्त्वभेदेऽपि 9/117, 146 वाचा सूचितशर्वरीरतिकला 8/189 | श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ 1/4 | सिषेव आत्मन्यवरुद्ध 14/158 वाष्पव्याकुलितारुण 14/181 | श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः 14/1 | सीतयाराधितो वह्निशछाया 9/211 विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च 10/146 | सुकुमारा भवेद्यत्र ललितं 14/192 विच्छेदावग्रहम्लान 10/1 | स | सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो 6/104, 10/170 विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्य 2/1 | संसारकूपपतितो 1/81, 13/136 | स्तनाधरादिग्रहणे हृत्प्रीत 14/197 विदग्धो नवतारुण्यः 8/187 | संसारतापानखिलान् 6/155 | स्त्रिय उरगेन्द्रभोग 8/223, 9/123 विन्यासभङ्गिरङ्गानां 14/192 | सख्यः श्रीराधिकाया 8/210 | स्थानस्थिताः श्रुतिगतां 8/67 विभुरपि सुखरूपः 8/205 | सङ्गीकरणं हर्षादुच्यते 14/174 | स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मित 13/79 विश्लेषामनुरञ्नेन जन 8/143 | सञ्चार्य रामाभिध-भक्त 8/1 | स्वचित्तवच्छीतलममुज्ज्वल 12/1 विष्णुराराध्यते पन्था 8/58 | स जहाति मतिं लोके 11/118 | स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरी 8/143 विष्णुशक्तिः परा 6/154, 8/152 | स जीयात् कृष्णचैतन्यः 13/1 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 9/270 वृन्दावने व्रजधनं ननु 14/228 | सन्दर्शनं विषयाणामथ 11/8 | स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च 6/181 वेणीमृजो नु मम 2/74 | संन्यासकृच्छ्रमः 6/104, 10/170 | ह वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग 6/254 | समः सर्वेषु भूतेषु 8/65 | हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव 6/242 श | सर्वगोपीषु सैवैका 8/98 | हसत्यथो रोदिति रौति 9/262 शठेन केनापि वयं हठेन 10/178 | सर्वधर्मान् परित्यज्य 8/63, 9/265 | हृदयं त्वदलोककातरं 4/197 शश्वद्भक्तिविनोदया समदया 10/119 | सर्वभूतेषु भूपाल 6/156 | हृद्वाग्वपुभिर्विदधन्नमस्ते 6/261 शुक्लो रक्तस्तथा पीत 6/101 | सर्वभूतेषु यः पश्येद्ध 8/274 | हे देव, हे दयित 2/65 शुष्कं पर्युषितं वापि 6/225 | स शुश्रूवान्मातरि भार्गवेण 10/145 | हे नाथ, हे रमण 2/65 श्र | स श्रीचैतन्यदेवो मे 1/1 | हेलोद्बूलित-खेदया 10/119 श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः 9/259 | सहर्षं गायद्भिः परिवृत 13/207 | हिया तिर्यग्-ग्रीवा 14/194 श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं 14/13 | सहस्रनामभिस्तुल्यं राम 9/32 | ह्लादतापकरी मिश्रा 6/157, 8/155 श्रियः कान्ताः कान्तः 14/227 | सहस्रनाम्नां पुण्यानां 9/33 | ह्लादिनी सन्धिनी 6/157, 8/155 566 ।