श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1493, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय 15/298-302 ] श्रीभट्टाचार्यके घरमें महाप्रभुका भोजन और श्रीभट्टाचार्यकी महाप्रभुके प्रति प्रीति :- ऐछे भट्ट-गृहे करे भोजन-विलास। तार मध्ये नाना चित्र-चरित्र-प्रकाश ॥ 298 ॥ सार्वभौम-घरे एइ भोजन-चरित। सार्वभौम-प्रेम याँहा हइला विदित ॥ 299 ॥ श्रीभट्टाचार्यकी पत्नीकी महाप्रभुके प्रति प्रीति, भक्तके सम्बन्धसे अपराध-क्षमा :- षाठीर मातार प्रेम, आर प्रभुर प्रसाद। भक्त-सम्बन्धे याहा क्षमिल अपराध ॥ 300 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार श्रीभट्टाचार्यके घरपर भोजनका आनन्द लिया। उस एक लीलामें उनकी अनेक अद्भुत लीलाएँ प्रकाशित हुईं। श्रीभट्टाचार्यके घरमें यह जो भोजन-लीला है, इसमें श्रीसार्वभौमका श्रीकृष्णप्रेम जगत्में प्रकाशित हुआ। और भी इसके द्वारा षाठीकी माताका प्रेम और अमोघको क्षमादान देनेसे महाप्रभुकी कृपा प्रकाशित हुई है। भक्तके सम्बन्धसे अमोघके अपराधके लिये क्षमा करनेसे उनकी भक्तवत्सलता प्रकाशित हुई है ॥ 298-300 ॥ अनुभाष्य—अमोघ महाप्रभुकी निन्दा करनेपर अपराधी हुआ था। अपराधके फलसे उसे प्राण हरनेवाला हैजाका रोग हुआ था। रोगग्रस्त होनेके बाद अमोघको अपराध दूर करनेका सुयोग प्राप्त नहीं हुआ। श्रीसार्वभौम और उनकी पत्नी महाप्रभुकी अत्यन्त कृपाके पात्र थे। उनके सम्बन्धसे महाप्रभुने इस अपराधी अमोघको दण्ड देनेके बदले उसके अपराधको क्षमा किया और उसके प्राणोंकी रक्षा करके श्रीकृष्णभक्ति प्रदान की। महाप्रभुके प्रति श्रीसार्वभौमकी पत्नीका प्रगाढ़ भक्तिपूर्ण सम्बन्ध था। बाहरी दृष्टिसे श्रीसार्वभौम अपने दामाद अमोघके पालन करनेवाले थे; इसलिये अमोघके अपराधको क्षमा न करनेपर उसके पालक श्रीसार्वभौमको ही गौण रूपसे दण्ड देना हो जाता। इसी कारणसे उसे क्षमा करके महाप्रभुने अपने ऐश्वर्य, गाम्भीर्य और औदार्यको प्रकाशित किया ॥ 300 ॥ पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीभट्टाचार्यके घरमें भोजन लीलाके श्रवणसे श्रीचैतन्यकी प्राप्ति :- श्रद्धा करि' एइ लीला सुने येइ जन। अचिरात् पाय से चैतन्य-चरण ॥ 301 ॥ अनुवाद—जो कोई भी श्रद्धापूर्वक इस लीलाका श्रवण करता है, उसे तत्क्षणात् ही श्रीचैतन्य-चरणोंकी प्राप्ति हो जाती है ॥ 301 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 302 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमगृहे भोजनविलासो नाम पञ्चदश-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 302 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सार्वभौमगृहमें भोजन-विलास नामक पन्द्रहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 47