श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1559, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय 17/142–145 ] श्रीनारायण-चरणकी तुलसी ब्रह्मज्ञ चतुःसनके भी देह और मनकी शुद्ध-सात्त्विक-विकारकारिणी :- श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द किञ्जल्कमिश्र-तुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 142 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥ 142 ॥ अनुभाष्य—मैत्रेय-विदुरके संवादमें दितिके गर्भके प्रभावसे भयभीत देवताओंको ब्रह्मा दितिके गर्भमें स्थित दोनों असुरोंका पूर्व-वृत्तान्त सुना रहे हैं,-पहले एकबार ब्रह्मर्षि चतुःसन अथवा कुमारगण श्रीनारायणके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठमें प्रवेश करके जब सातवें कक्षमें पहुँचे, तब 'जय' और 'विजय' नामक दो द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। भेदबुद्धिसे उत्पन्न द्वेषप्रवृत्तिके कारण क्रोधित द्वारपालोंको उन्होंने असुर योनिमें जन्म ग्रहण करनेका शाप दिया। सर्वज्ञ भगवान् पद्मनाभ यह जानकर उसी समय स्वयं ही लक्ष्मीजीके सहित वहाँ आ गये। ऋषियोंने अपनी ब्रह्मसमाधिके फल आराध्यदेव साक्षात् भगवान् श्रीनारायणको अपने समक्ष देखकर प्रणाम किया, उनके जैसे आत्माराम ब्रह्मज्ञानियोंके भाव-विकारका वर्णन,- अरविन्दनयनस्य (पद्मलोचनस्य) तस्य (भगवतः) पदारविन्दकिञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः (पदारविन्दयोः चरणकमलयोः किञ्जल्कैः केशरैः मिश्रा या तुलसी, तस्याः मकरन्देन संयुक्तः समीरणः) स्वविवरेण (निजनासारन्ध्रेण) अन्तर्गतः (अन्तःप्रविष्टः सन्) अक्षरजुषां (निर्विशेष-ब्रह्मपराणाम् अपि) तेषां (सनकादीनां कुमाराणां) चित्ततन्वोः (मनःशरीरयोः) संक्षोभं (चित्ते हर्षं देहे रोमाञ्चादिकं) चकार (अजीजनत्) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥ मायावादी लोग नित्य श्रीकृष्णसेवाके विरोधी होनेके कारण शुद्ध-नाम कीर्तनमें अनधिकारी :- अतएव 'कृष्णनाम' ना आइसे तार मुखे। मायावादिगण याते महा बहिर्मुखे ॥ 143 ॥ प्रेमकी बाढ़में काशीको डुबानेके लिये ही महाप्रभुका आगमन :- भावकालि बेचिते आमि आइलाङ काशीपुरे। ग्राहक नाहि, ना बिकाय, लञा याब घरे ॥ 144 ॥ लोभरूपी मूल्यसे ही महाप्रभुकी प्रेम-वितरणकी प्रतिज्ञा :- भारी बोझा लञा आइलाङ, केमने लञा याब ? अल्प-स्वल्प मूल्य पाइले, एथाइ बेचिब ॥" 145 ॥ अनुवाद—मायावादी लोग श्रीकृष्णसे अत्यन्त बहिर्मुख होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण-अपराधी होनेके कारण 'श्रीकृष्णनाम' प्रकाशानन्दके मुखमें नहीं आया। मैं भक्तिपूर्ण भावोंको बेचनेके लिये काशी नगरीमें आया था, किन्तु यहाँपर उनका कोई ग्राहक नहीं है। मैंने सोचा था कि यदि यहाँ बिक्री नहीं होगी, तब मैं उन्हें अपने घर लौटा ले जाऊँगा। परन्तु यहाँ बेचनेके लिये मैं इतना भारी बोझा उठाकर लाया हूँ, तब कैसे उसे लौटाकर ले जाऊँगा? इसलिये मूल्यका स्वल्प अंश भी मिलनेपर मैं उन्हें यहीं बेच दूँगा ॥" 143-145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्मय नामरसका पात्र—अतिशय भारी बोझा है। मैं पूर्ण श्रद्धा-मूल्यमें उसे जीवोंको बिक्री करता हूँ। व्यापारीके लिये इतना भारी बोझा लौटाकर ले जाना भी बहुत कठिन है, इसलिये अल्प-स्वल्प मूल्य अर्थात् श्रद्धा आभासरूपी मूल्य मिलनेपर भी इसी स्थानपर बेचकर जाऊँगा ॥ 145 ॥ अनुभाष्य—'अल्प-स्वल्प-मूल्य'-श्रीकृष्ण सेवामें लौल्य, लोभ अथवा रुचि; वह आत्मसमर्पणके बिना प्राप्त नहीं की जा सकती। मध्यलीला 8/70 संख्यामें उद्धृत पद्यावलीका श्लोक 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः' इस स्थानपर विचारणीय है ॥ 145 ॥ । 113