श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1573, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय 17/227-234 ] भ्रमण कर रहे थे, तब वह प्रेम लाख गुणा बढ़ गया था। जब महाप्रभु अन्य स्थानोंपर होते थे, तब वृन्दावनके नामसे ही उनमें प्रेमावेश आ जाता था। अब जब वे साक्षात् उस वृन्दावनमें भ्रमण कर रहे थे, तब महाप्रभुका मन दिन-रात प्रेममें निमग्न रहता था। स्नान-भोजनादिका निर्वाह तो वे अभ्यासवशतः कर रहे थे॥227-229॥ महाप्रभुका यह प्रेम अवर्णनीय :- एइमत प्रेम, यावत् भ्रमिल 'बार' वन। एकत्र लिखिलुँ, सर्वत्र ना याय वर्णन ॥ 230 ॥ अनुवाद-इसलिये महाप्रभुके बारह वनोंका भ्रमण करते हुए जैसा प्रेमावेश प्रकाशित हो रहा था, उसे मैंने एक ही स्थानपर सब लिख दिया है। विस्तारसे उसका सम्पूर्ण विवरण प्रदान करना सम्भव नहीं है॥230॥ भगवान् शेषकी भी महाप्रभुके वृन्दावनमें भ्रमण करते समय प्रेमके वर्णनमें असमर्थता :- वृन्दावने हैल प्रभुर यतेक प्रेमेर विकार। कोटि-ग्रन्थे 'अनन्त' लिखेन ताहार विस्तार ॥ 231 ॥ इस अध्यायमें उसका दिग्दर्शन मात्र ही वर्णित :- तबु लिखिबारे नारे तार एक कण। उद्देश करिते करि दिग्दरशन ॥ 232 ॥ अनुवाद-वृन्दावनमें महाप्रभुमें जितना प्रेमका विकार हुआ, करोड़ों ग्रन्थोंमें लिखकर श्रीअनन्तदेव उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं, किन्तु तब भी वे उसके एक कणको भी नहीं लिख पाते। इसलिये मैं तो केवल उसको इङ्गित करनेके लिये दिग्दर्शन मात्र ही करवा रहा हूँ॥231-232॥ श्रीकृष्णप्रीतिकी गाढ़ताके परिमाणके अनुसार ही श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाकी बाढ़का स्पर्श :- जगत् भासिल चैतन्यलीलार पाथारे। याँर यत शक्ति तत पाथारे साँतारे ॥ 233 ॥ अनुवाद-समस्त जगत् श्रीचैतन्यलीलाकी बाढ़में डूब गया। जिसमें जितनी शक्ति है, उतना ही वह उस बाढ़के जलमें तैरता है ॥ 233 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पाथार'-जलकी वृद्धिरूपी बाढ़॥233॥ सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 234 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीवृन्दावनगमनं नाम सप्तदश-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 234 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीवृन्दावनगमन नामक सतरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 127