भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1575

अठारहवाँ अध्याय कथासार-आरिट-ग्राममें राधाकुण्ड और श्याम- कुण्डका आविष्कार करके महाप्रभुने गोवर्धनमें 'हरिदेव'के दर्शन किये। महाप्रभु गोवर्धनके ऊपर चढ़कर श्रीगोपालका दर्शन नहीं करेंगे, इसलिये म्लेच्छोंके भयके 'छल'से श्रीगोपाल अन्नकूटग्राम (अन्यौर)से बाहर निकलकर गाठोली ग्राममें आ गये। महाप्रभुने गाठोली ग्राममें जाकर उनके दर्शन किये। भक्तवर श्रीरूप गोस्वामीको कृपापूर्वक दर्शन देनेके लिये श्रीगोपाल उसके बहुत दिनोंके बाद मथुरामें विट्ठलेश्वरके मन्दिरमें आकर 'एक मास' तक रहे थे-इस प्रसङ्गको श्रीकविराज गोस्वामीने इसी प्रसङ्गमें लिखा है। महाप्रभुने नन्दीश्वर, पावन-सरोवर, शेषशायी, खेलातीर्थ, भाण्डीर-वन, भद्रवन, लौहवन, महावन आदिके दर्शन किये और गोकुलके दर्शन करके मथुरामें लौट आये। अक्रूरघाटमें रहकर प्रतिदिन वृन्दावनमें जाकर कालीय-ह्रद, द्वादशादित्य-घाट, केशीघाट, रासस्थली, चीरघाट, इमलीतला आदिके दर्शन करने लगे। कालीय ह्रदमें रात्रिमें मछली पकड़नेवाले मछुवारेको 'श्रीकृष्ण' समझकर बहुतसे लोग आकर उनको ढूँढ़ने लगे थे। किन्तु महाप्रभुके दर्शन करके उनकी बुद्धिका भ्रम दूर होनेपर सभीको उनमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हुई। परन्तु महाप्रभुने स्वयंको संन्यासी अर्थात् एक चित्कण जीवके रूपमें कहा। महाप्रभु अक्रूरघाटमें बहुत समय तक डूबे रहे, इसलिये बलभद्र भट्टाचार्यने उनको ब्रजमण्डलसे प्रयाग ले जानेका निश्चय किया। 'सोरो-क्षेत्रमें गङ्गास्नान करके प्रयाग जायेंगे' उन्होंने ऐसा सोचकर यात्रा की। मार्गमें एक ग्राममें कुछ पठान घुड़सवारोंको साथ लेकर आते हुए बिजली खाँने महाप्रभुको प्रेमावेशमें मूर्च्छित देखा। 'उनके साथी उन्हें धतूरा खिलाकर मारकर उनका धन ले रहे हैं, - ऐसा कहकर उसने महाप्रभुके साथियोंको बाँध दिया। प्रेमावेशके भङ्ग होनेपर महाप्रभुका बिजली-खाँके दलके एक म्लेच्छ आचार्यके साथ वार्तालाप और शास्त्र विचार होनेपर महाप्रभुने 'कुरान- शास्त्र'से ही 'श्रीकृष्णभक्ति'को स्थापित किया। बिजली-खाँ और उसके अनुगत घुड़सवार महाप्रभुके चरणोंका आश्रय करके 'श्रीकृष्णभक्त' बन गये। उस स्थानपर आज भी 'पठान-वैष्णवोंका ग्राम' नामक एक ग्राम देदीप्यमान है। सोरोंमें गङ्गास्नान करके महाप्रभु त्रिवेणीमें पहुँच गये।

  • (अमृतप्रवाह भाष्य) वृन्दावनमें भ्रमण करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :- वृन्दावने स्थिरचरान्नन्दयन् स्वावलोकनैः। आत्मानञ्च तदालोकाद्गौराङ्गः परितोऽभ्रमत् ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - वृन्दावनमें अपने दर्शनके द्वारा स्थावर-जङ्गमको आनन्द प्रदान करके और उनके दर्शन करके स्वयं आनन्दित होकर श्रीगौराङ्गचन्द्र चारों ओर भ्रमण करने लगे ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- गौराङ्गः वृन्दावने स्वावलोकनैः (स्वस्य अवलोकनैः चक्षुर्भिः) स्थिरचरान् (स्थावरान् जङ्गमांश्च) तदालोकात् (स्थावरादीनाम् अवलोकं प्राप्य) आत्मानञ्च नन्दयन् परितः (इतस्ततः) अभ्रमत्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ । 129