श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1577, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/12-19 ] श्रीराधाकुण्डकी महिमा और माधुर्य अवर्णनीय :- श्रीगोविन्दलीलामृत (7/102)में- श्रीराधेव हरेस्तदीय-सरसी प्रेष्ठाद्भुतैः स्वैर्गुणै- र्यस्यां श्रीयुत्-माधवेन्दुरनिशं प्रीत्या तया क्रीड़ति। प्रेमास्मिन् बत राधिकेव लभते यस्यां सकृत् स्नानकृत् तस्या वै महिमा तथा मधुरिमा केनास्तु वर्ण्यः क्षितौ॥ 12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वह राधाकुण्ड-सरोवर श्रीराधाकी भाँति अपने अद्भुत गुणोंसे श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय है। उस कुण्डमें श्रीकृष्णचन्द्र सदा श्रीराधाके साथ क्रीड़ा करते हैं। उस कुण्डमें एकबार स्नान करनेपर (श्रीकृष्णमें) श्रीराधिका जैसा प्रेम प्राप्त होता है; इसलिये इस जगत्में श्रीराधाकुण्डकी महिमा और मधुरिमाका कौन वर्णन कर सकता है ? ॥ 12॥ अनुभाष्य- श्रीराधा इव तदीय-सरसी (राधाकुण्डं) स्वैः अद्भुतैः (अपूर्व्वैः) गुणैः हरेः (कृष्णस्य) प्रेष्ठा (परमप्रीतिप्रदा);-यस्यां (सरस्यां) श्रीयुतमाधवेन्दुः (श्रीकृष्णचन्द्रः) तया (राधया सह) प्रीत्या अनिशम् (अविरतं) क्रीड़ति, बत (अहो इति विस्मयार्थे) यस्यां (सरस्यां) सकृत् (बारमेकं) स्नानकृत् (अवगाहनकारी) अस्मिन् (कृष्णे) राधिका इव प्रेमा लभते तस्याः (राधा-सरस्याः) महिमा तथा मधुरिमा च क्षितौ (धरायां) केन (जनेन) वर्ण्यः (वर्णनीयः-न कोऽपि निर्णेतुं समर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ प्रेमावेशमें महाप्रभुके द्वारा स्तुति :- एइमत स्तुति करे प्रेमाविष्ट हञा। तीरे नृत्य करे कुण्डलीला स्मरिया॥ 13॥ कुण्डकी मिट्टीसे महाप्रभुके द्वारा तिलक लगाना, कुछ साथमें लेना :- कुण्डेर मृत्तिका लञा तिलक करिल। भट्टाचार्य-द्वारा मृत्तिका सङ्गे करि' लैल॥ 14॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर राधाकुण्डकी स्तुति कर रहे थे और कुण्डपर होनेवाली श्रीकृष्णकी लीलाओंका स्मरण करके उसके तटपर नृत्य कर रहे थे। महाप्रभुने कुण्डकी मिट्टीको लेकर अपने शरीरमें तिलक लगाये और बलभद्र भट्टाचार्यकी सहायतासे उन्होंने कुण्डकी कुछ मिट्टीको लिया तथा उसे अपने साथ ले गये॥ 13-14॥ कुसुम-सरोवरमें श्रीकृष्णसे अभिन्न गोवर्धनके दर्शनसे प्रेम :- तबे चलि' आइला प्रभु 'सुमनः-सरोवर'। ताँहा 'गोवर्धन' देखि' हइला विह्वल॥ 15॥ गोवर्धन देखि' प्रभु हइला दण्डवत्। 'एक शिला' आलिङ्गिया हइला उन्मत्त॥ 16॥ अनुवाद-तब राधाकुण्डसे चलकर महाप्रभु 'कुसुम- सरोवर'पर आ गये। वहाँ गोवर्धनके दर्शन करके प्रेममें विह्वल हो गये। गोवर्धनको देखकर महाप्रभुने दण्डवत् प्रणाम किया। गोवर्धनकी 'एक शिला'को आलिङ्गन करके महाप्रभु उन्मत्त हो गये॥ 15-16॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सुमनः-सरोवर'-कुसुम- सरोवर॥ 15॥ गोवर्धन-ग्राममें श्रीहरिदेव-दर्शन :- प्रेमे मत्त चलि' आइला गोवर्धन-ग्राम। 'हरिदेव' देखि' ताँहा हइला प्रणाम॥ 17॥ 'मथुरा'-पद्मेर पश्चिमदले याँर वास। 'हरिदेव' नारायण-आदि परकाश॥ 18॥ हरिदेव-आगे नाचे प्रेमे मत्त हञा। सब लोक देखिते आइल आश्चर्य शुनिया॥ 19॥ अनुवाद-प्रेममें मत्त महाप्रभु कुसुम सरोवरसे चलकर गोवर्धन ग्राममें आ गये। वहाँ महाप्रभुने श्रीहरिदेवके दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया। मथुरारूपी कमलके पश्चिम दलपर श्रीहरिदेवका वास है तथा वे । 131