श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1624, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/50-54 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान पूजनीय है॥"50॥ अनुभाष्य— अभक्तः (शुद्धभक्तिविहीनः) चतुर्वेदी (चतुर्वेदनिपुणः ब्राह्मणः) मे (मम) प्रियः न (भवति); मद्भक्तः श्वपचः (सुनीचकुलोद्भवोऽपि) मे प्रियः (भवति); तस्मै (शुद्धभक्ताय नीचकुलोद्भवाय श्वपचाय) [अपि चतुर्वेदकुशलैर्ब्राह्मणादिभिः एव सम्मानादिकं] देयम्; ततः (तस्मात् नीचकुलोद्भूतात् श्वपचात् अपि शुद्धभक्तात्) ग्राह्यं (तदुच्छिष्टादिकं प्रतिगृह्णीयात्), यथा अहं (सर्वेश्वरेश्वरः श्रीभगवान् विष्णुः) पूज्यः [तथा] सः (श्वपचकुलजातोऽपि भक्तः) [तच्छिष्यस्थानीय-ब्राह्मणादिभिः सर्वैः एव पूज्यः च]। श्लोक-भावानुवाद—शुद्धभक्तिविहीन चतुर्वेदोंमें निपुण ब्राह्मण मेरा प्रिय नहीं है, सुनीचकुलमें उत्पन्न मेरा भक्त मुझे प्रिय है। नीचकुलमें उत्पन्न शुद्धभक्त चतुर्वेदोंमें निपुण ब्राह्मणोंके द्वारा सम्मान दिये जाने योग्य और शुद्धभक्त होनेके कारण नीचकुलमें उत्पन्न चण्डालका उच्छिष्ट ग्रहण करनेके योग्य है। वह मेरे समान ही पूजनीय है [उसके शिष्य-स्थानीय ब्राह्मणादिके द्वारा भी पूजनीय है]॥50॥ महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन और दोनोंके मस्तकपर अपने चरणार्पण :- एइ श्लोक पड़ि' दुँहारे कैला आलिङ्गन। कृपाते दुँहार माथाय धरिला चरण॥51॥ अनुवाद—महाप्रभुने यह श्लोकका पढ़कर उन दोनोंका आलिङ्गन किया और कृपापूर्वक अपने चरणकमल उन दोनोंके सिरपर रख दिये॥51॥ दोनों भाइयोंके द्वारा महाप्रभुका स्तव :- प्रभु-कृपा पाञा दुँहे दुइ हात युड़ि'। दीन हञा स्तुति करे विनय आचरि'॥52॥ अनुवाद—महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करके दोनों भाई दोनों हाथ जोड़कर दीनतापूर्वक विनयका आचरण करते हुए स्तुति करने लगे॥52॥ स्वरूप-नाम-रूप-गुण-लीलामय और सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनाधिदेवता श्रीगौरको प्रणाम :- श्रीरूप-वचन— नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते। कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥53॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥53॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महावदान्य, श्रीकृष्णप्रेमप्रदाता, श्रीकृष्णस्वरूप, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीगौराङ्गरूपधारी प्रभु आपको नमस्कार है॥53॥ अनुभाष्य— महावदान्याय (अतुलपरमकरुणामयाय) कृष्णप्रेमप्रदाय (शिवविरिञ्चिदुर्लभकृष्णप्रेमदातृप्रवराय) कृष्णचैतन्यनाम्ने (कृष्णचैतन्याख्याय) गौरत्विषे (श्रीराधाद्युतिसुवलित-गौरकान्तिमयाय) कृष्णाय (गोपीजनवल्लभाय गोविन्दाय) ते (तुभ्यं) नमः। श्लोक-भावानुवाद—अतुलनीय परम करुणामय, शिव-ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ श्रीकृष्णप्रेमको प्रदान करनेमें अग्रणी, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीराधाकान्तियुक्त गौरकान्तिमय श्रीगोपीजनवल्लभ-गोविन्द, आपको नमस्कार है॥53॥ ग्रन्थकारके द्वारा श्रीगौर-प्रणाम— श्रीगोविन्दलीलामृत (1/2)में ग्रन्थकारके वचन— योऽज्ञानमत्तं भुवनं दयालुरुल्लाघयन्नप्यकरोत् प्रमत्तम्। स्वप्रेमम्पत्सृधयाद्भुतेहं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥54॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥54॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन दयालु पुरुषने अज्ञानमें मत्त जगत्को अज्ञानरूपी व्याधिसे मुक्त करके अपनी प्रेम-सम्पत्तिरूपी अमृतके द्वारा प्रमत्त किया था, मैं उन अद्भुत-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णचैतन्यके शरणागत होता हूँ॥54॥ अनुभाष्य— यः दयालुः (करुणामयविग्रहः) अज्ञानमत्तं (मायावाद- कर्मफलभोगादि-मार्ग-कारणे अज्ञाने मत्तं विह्वलं) भुवनं (लोकं) स्वप्रेमत्सम्पत्सुधया (निजकृष्णप्रीतिरूपा सम्पत् श्रीः सा एव सुधा अमृतं तया) उल्लाघयन् (तत्तज्ज्ञानादिकं प्रशमयन्) प्रमत्तं 178 |