श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1699, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/186-193 ] श्रीअनिरुद्ध-ये मुख्य चतुर्व्यूह 'प्राभवविलास' कहलाते हैं॥ 186॥ उनमेंसे एक मूर्तिमें ही श्रीबलराम-व्रजमें गोपाभिमानी और पुरमें क्षत्रियाभिमानी; विलास-संज्ञाका कारण :- व्रजे गोपभाव रामेर, पुरे क्षत्रिय-भावन। वर्ण-वेश-भेद, ताते 'विलास' ताँर नाम ॥ 187 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके समान ही श्रीबलरामका व्रजमें गोपभाव और मथुरा एवं द्वारकामें उनका क्षत्रिय होनेका अभिमान है। परन्तु श्रीकृष्णसे वर्ण और वेशका भेद होनेके कारण उन्हें 'विलास' कहा जाता है॥ 187॥ वैभवप्रकाशके रूपमें और प्राभवविलास (आदि चतुर्व्यूह) के रूपमें भावके भेदसे एक ही श्रीबलराम :- वैभवप्रकाशे आर प्राभवविलासे। एकइ मूर्त्ये बलदेव भाव-भेदे भासे ॥ 188 ॥ अनुवाद-वैभवप्रकाशमें और प्राभवविलासमें भावके भेदसे एक ही बलदेव प्रकाशित होते हैं॥ 188 ॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव-श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं; वे ही आदि-चतुर्व्यूह श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्ध, - इन चार प्राभव विलासोंमें भावभेदसे (श्रीसङ्कर्षणरूपमें) प्रकाशित हैं॥ 188 ॥ प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूह ही समस्त चतुर्व्यूहरूपी वैभवविलासगणोंका कारण :- आदि-चतुर्व्यूह-केह नाहि इँहार सम। अनन्त चतुर्व्यूहगणेर प्राकट्य-कारण ॥ 189 ॥ वे ही पुरीके (मथुराके और द्वारकाधामके) अधीश्वर :- कृष्णेर एइ चारि प्राभवविलास। द्वारका-मथुरा-पुरे नित्य इँहार वास ॥ 190 ॥ अनुवाद-आदि चतुर्व्यूहके समान कोई नहीं है अर्थात् वे अद्वितीय हैं। वे ही अनन्त चतुर्व्यूहोंके प्राकट्यका कारण हैं। श्रीकृष्णके इन चार प्राभवविलासोंका नित्य ही द्वारकापुरी और मथुरापुरीमें वास है॥ 189-190 ॥ अनुभाष्य-अनन्त चतुर्व्यूहोंके गण आदि-चतुर्व्यूहके समान नहीं हैं; आदि-चतुर्व्यूह-प्राभवविलास हैं, अन्य चतुर्व्यूहगण-वैभवविलास हैं; प्राभवविलास ही वैभवविलासके प्राकट्यका कारण है। परव्योमके ऊपरी भागमें गोलोकके तीन प्रकारके प्रकोष्ठोंमें मथुरा और द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णका प्राभवविलास नित्य अवस्थित है। गोकुलमें वैभवप्रकाश श्रीबलदेव नित्य विराजमान हैं। चारों प्राभवविलासोंमेंसे प्रत्येकके चारों हाथोंमें अस्त्रके भेदसे चौबीस मूर्तियोंके रूपमें वैभवविलास प्रकाशित हैं॥ 189-190 ॥ (1) आदि चतुर्व्यूहसे ही नाम और अस्त्रकी विचित्रतासे 24 प्रकारके 'वैभवविलास' :- एइ चारि हैते चब्बिश मूर्त्ति परकाश। अस्त्रभेदे नाम-भेद-वैभवविलास ॥ 191 ॥ अनुवाद-इन चारोंसे ही चौबीस मूर्तियाँ प्रकाशित होती हैं। चारों हाथोंमें धारण करनेवाले अस्त्रोंके भेदसे इनके नामोंमें भेद है। ये वैभवविलास कहलाते हैं॥ 191 ॥ (क) पुरमें आदि-चतुर्व्यूहके साथ श्रीकृष्ण ही वैकुण्ठमें दूसरे चतुर्व्यूहके साथ श्रीनारायणरूपमें विलासविग्रह :- पुनः कृष्ण चतुर्व्यूह लञा पूर्वरूपे। परव्योम-मध्ये वैसे नारायणरूपे ॥ 192 ॥ ताँहा हैते पुनः चतुर्व्यूह-परकाश। आवरणरूपे चारिदिके याँर वास ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण पुनः विस्तार करते हैं और पहलेकी भाँति चतुर्व्यूहको अपने साथ लेकर परव्योममें श्रीनारायणके रूपमें वास करते हैं। मूल चतुर्व्यूहसे पुनः द्वितीय चतुर्व्यूह प्रकाशित होता है, जिनके वासस्थान श्रीनारायणको चारों ओरसे आवृत करते हैं॥ 192-193 ॥ अनुभाष्य-ऊपरी गोलोकके नीचेवाले भागमें परव्योममें श्रीकृष्ण ही चतुर्भुजरूप होकर श्रीनारायणरूपमें विराजमान हैं। परव्योमनाथ श्रीनारायणसे पुनः आवरणरूपमें चारों ओर अनन्त चतुर्व्यूह प्रकाशित होते हैं॥ 192-193 ॥ । 253