श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1819, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाइसवाँ अध्याय [22/156-159 ]
करनेमें असमर्थ होनेपर, मन-ही-मनमें ही व्रजवास करेंगे॥ 156॥
अनुभाष्य— कृष्णं च अस्य (कृष्णस्य) प्रेष्ठं (प्रियतमं) निजसमीहितं (निजाभीष्टं जनं) च स्मरन् असौ (साधकः) तत्तत्कथारतः (तत्तद्रसोचित-कथानुरक्तः सन्) सदा (नित्यकालं) व्रजे (नन्दनन्दन-सेवामय-वृन्दावने) वासं कुर्यात् (स्थूलशरीरे मनसापि वा नित्यनिवासं स्थापयेत्—कृष्णभजनविहीनस्य धामवासः प्राकृत-विषय-भोग-विमूढ़स्य कदापि न भवति, परन्तु नित्यभजनशीलस्य लौकिकदृष्ट्या अन्यत्रावस्थानेऽपि अहरहः नित्यधामवास एव स्यादिति भावार्थः)।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (श्रीकृष्ण-भजनविहीन प्राकृत विषयभोगी विमूढ़ व्यक्तिका धाममें रहनेपर भी धामवास नहीं होता, परन्तु नित्य भजनशील भक्तका लौकिक दृष्टिसे धामसे बाहर अन्यत्र रहनेपर भी दिन-रात नित्यधामवास होता है।)॥ 156॥
रागानुग-भक्तोंकी चार रसोंमें श्रीकृष्णसेवा, शान्तरसमें विद्यमानता नहीं :- दास-सखा-पित्रादि-प्रेयसीर गण। रागमार्गे निज-निज-भावेर गणन ॥ 157 ॥
अनुवाद— श्रीनन्दनन्दनके भक्तोंमें कोई दास भावसे, तो कोई सखा भावसे, तो कोई वात्सल्य (पिता-मातादि) भावसे और कोई प्रेयसीके भावसे उन्हें प्रेम करते हैं। रागमार्गमें वे अपने-अपने भावके अनुरूप प्रवृत्त होते हैं॥ 157॥
रागानुग-भक्त श्रीकृष्णके साथ चार रसोंमें सम्बन्धयुक्त और अनन्यभक्त हैं तथा काल और प्रकृतिसे अतीत हैं :- श्रीमद्भागवत (3/25/38)में— न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढ़ि हेतिः। येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्॥ 158 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 158 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— मैं ही जिनका प्रिय, आत्मा, पुत्र, सखा, गुरु, सुहृत्, देव और इष्ट हूँ, वे सदैव मेरे परायण रहते हैं। हे शान्तरूपे माता, मेरा कालचक्र उनका कभी भी नाश नहीं करता ॥ 158 ॥
अनुभाष्य— भगवान् मैत्रेय-ऋषि विदुरको कपिल-देवहूतिके संवादका वर्णन कर रहे हैं। देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलदेवसे भगवद्भक्तियोग और आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा करनेपर, उन्होंने सांख्ययोग-नामसे प्रसिद्ध शुद्धभक्तियोगका वर्णन करते हुए सर्वप्रथम भक्तिको सर्वश्रेष्ठ अभिधेय बतलाकर शुद्धभक्त हरिजनोंका माहात्म्य बतला रहे हैं,—
[हे मात:,] शान्तरूपे (मन्निष्ठामयि, शान्तं विकाररहितं शुद्धसत्त्वं रूपं यस्मिन् तद्रूपे नित्यधाम्नि वैकुण्ठे वा) येषां (भक्तानाम्) अहं प्रियः (प्रेमपात्रं), सुतः (स्नेहविषयः), आत्मा (प्रेष्ठः), सखा (विश्वासास्पदं), गुरुः (उपदेष्टा), सुहृदः (हितकारी), इष्टं देवं (पूज्यः) [ते एव मद्भक्ताः, अतः मया रक्षमाणाः] कर्हिचित् (कदाचिदपि) न नङ्क्ष्यति (निर्विशेषाः, भोग्यहीना न भवन्ति यतः) अनिमिषः (कालः) मे (मदीयः) हेतिः (कालचक्रं) न लेढ़ि (तान् न ग्रसते)।
श्लोक-भावानुवाद— [हे माते!] मुझमें निष्ठायुक्त शुद्धसत्त्वमय नित्यधाम वैकुण्ठमें जो भक्त हैं, मैं उनका प्रेमका पात्र, पुत्र (स्नेहका विषय), आत्मा (प्रियतम), सखा (विश्वासास्पद), गुरु (उपदेष्टा), सुहृत् (हितकारी) और इष्टदेव (पूज्य) हूँ। [वे मेरे भक्त मेरे द्वारा रक्षित हैं, इसलिये] वे कदापि भोग्यहीन नहीं होते [प्राकृत स्वर्गादि नाशवान् हैं, परन्तु वैकुण्ठमें भोग्यवस्तुके नष्ट होनेकी कोई आशङ्का नहीं है]। मेरा कालचक्र भी उनको ग्रास करनेमें असमर्थ है॥ 158॥
रागानुग भक्तोंको प्रणाम :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/308)— पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवन्मित्रवद्धरिम्। ये ध्यायन्ति सदोद्युक्तास्तेभ्योऽपीह नमो नमः ॥ 159 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥
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