भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1823, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1823

तेइसवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुने इसके बाद श्रीसनातनसे भावके लक्षण, प्रेमके और प्रेमके उत्पन्न होनेके लक्षण और उदित-भाव (जिनमें भाव उदित हो गया है, ऐसे) व्यक्तियोंके व्यवहार-लक्षण वर्णन करके प्रेम जिस क्रमसे 'महाभाव' होता है, उसका तथा पाँच प्रकारकी रतिकी व्याख्यासे उस-उस रसकी व्याख्या, रसकी स्थिति और शृङ्गार रसका सर्वोत्कर्ष संस्थापन एवं उसके स्वकीय-परकीय-भेदसे विविध होनेका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंकी व्याख्या, राधिकाके पच्चीस गुणोंकी व्याख्या और श्रीकृष्णभक्तिरसके अधिकारीका स्वरूप और अष्टाङ्ग-लक्षणोंका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीसनातनको भागवतके गूढ़ सिद्धान्त, हरिवंशमें लिखित गोलोककी नित्यलीला, केशावतारकी विरुद्ध-व्याख्या और शुद्ध व्याख्या—इन समस्त शिक्षाओंको प्रदान करके श्रीसनातनके मस्तकपर हस्त अर्पण करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अनर्पितचर-नामप्रेमप्रदाता महावदान्य श्रीगौरको प्रणाम :— चिरादत्तं निज-गुप्तवित्तं स्वप्रेम-नामामृतमत्युदारः। आपामरं यो विततार गौरः कृष्णो जनेभ्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने प्रेमनामामृतरूपी गुप्त धन,—जिसे इससे पूर्व और किसीको भी नहीं दिया गया था, उसे ही—अति उदार स्वभाववाले जिन श्रीगौरकृष्णने आ-पामर (पवित्रसे लेकर पतित तक, सभी) व्यक्तियोंको वितरण किया था, उनके प्रति मैं शरणागत होता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अत्युदारः (महावदान्यः) यः गौरः कृष्णः चिरात् अदत्तम् (अनर्पितचरं) निजगुप्तवित्तं (स्वकीय-गूढ़रहस्यात्मकधनं) स्वप्रेमनामामृतम् आपामरं (साध्वसाध्वधिकार-निर्विशेषेण) जनेभ्यः विततार (अर्पयामास), तं (गौरकृष्णम्) अहं प्रपद्ये (शरणं यामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर- भक्तोंकी जय हो॥2॥ श्रीसनातन-शिक्षा—(3) प्रयोजन (श्रीकृष्णप्रेम)-वर्णन :— अभिधेय 'साधनभक्ति'के फलसे प्रयोजनरूप 'साध्य'- प्रेमभक्ति :— “एबे शुन भक्तिफल ‘प्रेम’ प्रयोजन। याहार श्रवणे हय भक्तिरस-ज्ञान ॥ 3 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अब तुम भक्तिके फल 'प्रेम'रूपी प्रयोजनके विषयमें सुनो। जिसे सुननेसे भक्तिरसका ज्ञान होता है॥3॥ भाव अथवा रति—प्रेमकी तरल अथवा अङ्कुरावस्था; गाढ़ अथवा पक्व अवस्थामें वही 'प्रेम' :— कृष्णे रति गाढ़ हैले 'प्रेम'-अभिधान। कृष्णभक्ति-रसेर सेइ 'स्थायिभाव'-नाम ॥ 4 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति रतिके गाढ़ होनेपर वह । 377