श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1836, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/57-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नाम दिव्योन्माद है। इसमें विरहमें श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति होती है और भक्त स्वयंको ही 'कृष्ण' मानने लगता है॥ 57 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/87 संख्या देखें॥ 54-57 ॥ दो प्रकारके शृङ्गार-रस-(1) सम्भोग और (2) विप्रलम्भ; सम्भोग असंख्य प्रकारका :- 'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे द्विविध शृङ्गार। 'सम्भोगे'र अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार॥ 58 ॥ अनुवाद-'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ'के भेदसे शृङ्गार रस दो प्रकारका होता है। 'सम्भोग'के अनन्त अङ्ग हैं, उनका अन्त नहीं है॥ 58 ॥ अनुभाष्य- 'विप्रलम्भ'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरणमें 2-3 श्लोक)- “यूनोरयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथ यो मिथः। अभीष्टालिङ्गनादीनामनाप्तौ प्रकृष्यते। स विप्रलम्भो विज्ञेयः सम्भोगोन्नतिकारकः॥” “न विना विप्रलम्भेन सम्भोगः पुष्टिमश्नुते।” अर्थात् “नायक-नायिकाके प्रथम मिलनसे पहले अयुक्त, मिलन होनेके बाद युक्त-इन दोनों समयमें परस्पर अभीष्ट आलिङ्गनादिकी अप्राप्तिसे जो भाव होता है, उसे 'विप्रलम्भ' कहते हैं; वह सम्भोगका पुष्टिकारक है।” 'सम्भोग'- “दर्शनालिङ्गनादीनामानुकूल्यान्निषेवया। यूनोरुल्लासमारोहन् भावः सम्भोग ईर्यते॥” अर्थात् “दर्शन और आलिङ्गनादिके परस्पर सुख-तात्पर्यमूलक व्यवहारके द्वारा नायक और नायिकाके उल्लास-प्राप्त भावको 'सम्भोग' कहते हैं।” इस श्लोककी (1) श्रीजीव-प्रभुकृत-टीका- 'आनुकूल्यादिति काममयः सम्भोगो व्यावृतः।' अर्थात् “आनुकूल्य कहनेसे काममय अथवा यथेच्छाचारको पृथक् किया है।” (2) श्रीचक्रवर्त्ति-टीका- 'पशुवच्छृङ्गारो व्यावृतः।' अर्थात् “यहाँपर शास्त्रोक्त रीतिसे आचरण-दर्शनादिका सेवन कहकर पशुवत् शृङ्गारका स्थान नहीं है।” जाग्रत-अवस्थामें मुख्य-सम्भोग चार प्रकारका है (1) पूर्वरागके बाद 'संक्षिप्त', (2) मानके बाद 'सङ्कीर्ण', (3) अल्प दूर प्रवासके बाद 'सम्पन्न' और (4) सुदूर प्रवासके बाद 'समृद्धिमान्'। स्वप्नावस्थामें गौण-सम्भोग भी पहलेकी भाँति चार प्रकारका है॥ 58 ॥ चार प्रकारका विप्रलम्भ :- 'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वराग, मान। प्रवासाख्य, आर प्रेमवैचित्त्य-आख्यान॥ 59 ॥ अनुवाद-'विप्रलम्भ' पूर्वराग, मान, प्रवास और प्रेम-वैचित्त्यके भेदसे चार प्रकारका है॥ 59 ॥ अनुभाष्य- 'पूर्वराग'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरण पाँचवाँ श्लोक)- “रतिर्या सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा॥ तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥” अर्थात् “जो रति सङ्गमसे पहले दर्शन-श्रवणादिसे उत्पन्न होकर दोनोंके विभावादिके मिश्रणसे आस्वादमयी होती है, वही 'पूर्वराग' है।” 'मान'- “दम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः। स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥” अर्थात् “परस्पर अनुरक्त एकत्र अवस्थित अथवा भिन्न स्थानपर स्थित नायक और नायिकाके अपने अभीष्टके दर्शन और आलिङ्गनादिका निरोध करनेवाले भावको 'मान' कहते हैं।” 'प्रवास'- “पूर्वसङ्गतयोर्यूनोर्भवेद्देशान्तरादिभिः। व्यवधानस्तु यत्प्राज्ञैः स प्रवास इतीर्यते॥” अर्थात् “पूर्व-सङ्गमसे युक्त दम्पत्तिकी देशान्तरमें 390 |