भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1853

तेइसवाँ अध्याय 23/117-122 ] आपके मनमें इच्छा हो, तब आप मेरे सिरपर अपने चरण रखकर मुझे यह वर प्रदान कीजिये कि 'मैंने तुम्हें जो भी सिखाया है, वह सब तुम्हारे हृदयमें स्फुरित हो।' आपके द्वारा दिये गये इस वरदानसे ही मुझे बलकी प्राप्ति होगी जिससे मैं इसका वर्णन कर सकूँगा॥" 117-118॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :- तबे महाप्रभु ताँर शिरे धरि' करे। वर दिला—'एइ सब स्फुरुक तोमारे ॥' 119 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर अपना हाथ रखकर वर दिया—'ये सब शिक्षाएँ तुममें स्फुरित हों ॥' 119 ॥ श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनतत्त्व और महाप्रभुकी कृपाका आख्यान संक्षेपमें वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ—'प्रेम' प्रयोजन-संवाद। विस्तारि' कहन ना याय प्रभुर प्रसाद ॥ 120 ॥ अनुवाद—श्रील कविराज गोस्वामी कह रहे हैं कि मैंने महाप्रभु और श्रीसनातन गोस्वामीके बीच हुए 'प्रेम' रूपी प्रयोजनके संवादका संक्षेपमें ही वर्णन किया है, क्योंकि महाप्रभुकी कृपाका विस्तारसे वर्णन करना मेरे लिये सम्भवपर नहीं है॥ 120॥ महाप्रभुके उपदेशामृतके श्रवणसे आत्माकी चिद्वृत्ति श्रीकृष्णसेवाका ज्ञानोदय और प्रेमकी प्राप्ति :- प्रभुर उपदेशामृत शुने येइ जन। अचिरात् मिलये ताँरे कृष्णप्रेमधन ॥ 121 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको दिये गये महाप्रभुके इस उपदेशामृतका जो कोई भी श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति होती है॥ 121॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 122 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे प्रेमप्रयोजन- विचारो नाम त्रयोविंशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 122॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें प्रेमप्रयोजन-विचार नामक तेइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 407