श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1867, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/79-84 ]
लिये निर्विशेष-ब्रह्मके रूपमें और योगमार्गके साधकोंके समक्ष अन्तर्यामी-परमात्माके स्वरूपमें ही प्रकाशित होते हैं॥ 79॥
दो प्रकारकी भक्ति (रागमयी और वैधी)के द्वारा दो प्रकारके भगवद्-स्वरूप (स्वयं श्रीकृष्ण और उनके प्रकाश)की प्राप्ति :- रागभक्ति, विधिभक्ति हय दुइरूप। 'स्वयं-भगवत्ता', 'प्रकाश'-दुइत' स्वरूप ॥ 80 ॥
रागानुगा-भक्तिकी सिद्धि होनेपर व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन, वैधीभक्तिकी सिद्धि होनेपर वैकुण्ठमें श्रीनारायणका दास्य :- रागभक्त्ये व्रजे स्वयं-भगवाने पाय। विधिभक्त्ये पार्षददेहे वैकुण्ठके याय ॥ 81 ॥
अनुवाद - भक्ति दो प्रकारकी होती है-रागभक्ति और वैधीभक्ति। रागभक्तिके द्वारा साधक 'स्वयं-भगवान्' और वैधीभक्तिके द्वारा साधक 'भगवद्-प्रकाश' - इन दो स्वरूपोंको प्राप्त करते हैं। रागभक्तिके पालनसे साधकको व्रजमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। वैधीभक्तिके पालनसे साधक पार्षद-देह प्राप्त करके वैकुण्ठमें जाता है॥ 80-81॥
श्रीमद्भागवत (10/9/21) में- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 82 ॥
अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 82 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/227 संख्या देखें ॥ 82 ॥
श्रीमद्भागवत (3/15/25)में- यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे-यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः। भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग- वैक्लव्यवाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः ॥ 83 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-परस्पर श्रीकृष्णकथाके वर्णनमें जिनके अनुरागसे विवश होकर अश्रु बहते हैं और अङ्ग पुलकित हो जाते हैं, वे देवादिदेव (देवोंके भी आदि देव) श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए यम-नियमादिको दूर फेंककर स्पृहाशील होकर हमारे (सत्यलोकके) ऊपर स्थित वैकुण्ठमें गमन करते हैं॥ 83 ॥
अनुभाष्य-व्यास-सखा श्रीमैत्रेय ऋषि श्रीविदुरको दितिके गर्भसे भयभीत देवताओंके निकट ब्रह्माके द्वारा दितिके गर्भमें स्थित दो असुरोंके पूर्व-वृत्तान्तको बतलाते हुए चतुःसनादिके वैकुण्ठ-गमनके उपाख्यानके वर्णनके प्रसङ्गमें वैकुण्ठके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,-
अनिमिषां (कालानधीनानां देवानाम्) ऋषभानुवृत्त्या (ऋषभस्य श्रेष्ठस्य श्रीहरेः अनुवृत्त्या अनुसरणेन) दूरे-यमाः (दूरे यमः येषां ते, यद्वा, दूरीकृतयमनियमाः) स्पृहणीयशीलाः (स्पृहणीयं कारुण्यादि शीलं येषां ते) भर्तुः (हरेः) सुयशसः (सुमङ्गल- लीलागुणस्य) मिथः (परस्परं) कथानुरागवैक्लव्यवाष्पकलया (कथने वर्णने यः अनुरागः, तेन वैक्लव्य वैवश्यः तेन वाष्पकला अश्रुबिन्दुः तया सह) पुलकीकृताङ्गाः (पुलकीकृतं रोमाञ्चितम् अङ्गं येषां ते तथाभूताः) च नः (अस्माकम्) उपरि (उपरिस्थितं) यत् च [वैकुण्ठं] व्रजन्ति (गच्छन्ति) [तत् विकुण्ठमुपेत्य मुनयः परां मुदमापुरिति परेणान्वयः]।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इस श्लोकका अगले श्लोकके तीसरे और चौथे चरणके साथ अन्वय करें।]॥ 83 ॥
तीन प्रकारके उपासक :- सेइ उपासक हय त्रिविध प्रकार। अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम आर ॥ 84 ॥
अनुवाद-वे उपासक (साधक) भी तीन प्रकारके होते हैं-अकाम (सभी प्रकारकी स्वसुख कामनाओंसे रहित), मोक्षकाम (मोक्षकी कामनासे युक्त) और सर्वकाम (सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त) ॥ 84 ॥
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