श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1875, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/124-130 ] नहीं हैं। जो भक्तिकी सहायतासे जीवन्मुक्त होते हैं, वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन करते हैं। और केवल शुष्कज्ञानसे स्वयंको जीवन्मुक्त माननेवाले अपराधके कारण अधोःपतित होते हैं॥124-125॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अपराधे अधो मजे'—शुष्कज्ञान- जनित जीवन्मुक्त (अभिमानी)-लोग अपराधवशतः अधःपतित होकर मजे अर्थात् नष्ट हो जाते हैं॥125॥ श्रीमद्भागवत (10/2/32)में— येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥126॥ अनुवाद—हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥126॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/30 संख्या देखें॥126॥ श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में— ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥127॥ अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥127॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें॥127॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/44)में उद्धृत बिल्वमङ्गल वाक्य :— अद्वैतवीथिपथिकैरुपस्याः स्वानन्दसिंहासनलब्ध दीक्षाः। शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन॥128॥ अनुवाद—अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा उपास्य और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥128॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 10/178 संख्या देखें॥128॥ (ग) स्वरूप-प्राप्त भक्तोंका चिदानन्ददेहसे श्रीकृष्णभजन :— भक्तिबले 'प्राप्तस्वरूप' दिव्यदेह पाय। कृष्णगुणाकृष्ट हञा भजे कृष्ण-पांय॥129॥ अनुवाद—'प्राप्तस्वरूप' (स्वरूपकी उपलब्धि करनेवाला) जीव भक्तिके बलसे दिव्यदेहको प्राप्त करता है और श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥129॥ दस प्रकारके लक्षणोंमेंसे निरोध और मुक्तिके लक्षण :— श्रीमद्भागवत (2/10/6)में— निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः। मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥130॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥130॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीहरिकी योगनिद्राके बाद] शक्तिगणोंके अर्थात् उपाधियोंके साथ आत्माके शयनको जीवका 'निरोध' कहा जाता है। अन्य प्रकारके रूपका (मायिक स्थूल-सूक्ष्म रूपका) परित्यागकर स्व-स्वरूपमें विशेषरूपसे अवस्थानका नाम 'मुक्ति' है॥130॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय,—महापुराणके इन दस लक्षणोंको दशम-पदार्थ | 429