श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1901, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/279–288 ] अन्यान्य स्वरूप, सभी भगवान्नामके द्वारा कहलाये जानेवाले और उनसे अभिन्न भगवद्-विग्रह होनेपर भी वैधीभक्तिके मार्गसे ही प्राप्य हैं॥ 279 ॥ स्थूलरूपमें दो प्रकारके भक्त-(1) विधिपूजक, (2) रागयुक्त भक्त :- ताँते रमे येह, सेइ सब—‘आत्माराम’। ‘विधिभक्त’, ‘रागभक्त’,—दुइविध नाम ॥ 280 ॥ अनुवाद—स्वयं-भगवान् अथवा उनके अन्य भगवद्-स्वरूपोंके सेवानन्दको जो अनुभव करते हैं, वे सब ‘आत्माराम’ हैं। ऐसे आत्माराम ‘विधिभक्त’ और ‘रागभक्त’—इन दो प्रकारके होते हैं॥ 280 ॥ दोनोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकार—(1) नित्यसिद्ध, (2) साधनसिद्ध, (3) और (4) दो प्रकारके साधक :- दुइविध भक्त हय चारि चारि प्रकार। पार्षद, साधनसिद्ध, साधकगण आर ॥ 281 ॥ कुल मिलाकर आठ प्रकारके :- जात-अजात-रतिभेदे साधक दुइ भेद। विधि-राग-मार्गे चारि चारि—अष्ट भेद ॥ 282 ॥ अनुवाद—विधिभक्त और रागभक्त आत्माराम—ये दोनों चार-चार प्रकारके होते हैं। पार्षद, साधनसिद्ध, जातरति-साधक और अजातरति-साधक। चार प्रकारके विधिमार्गके भक्त और चार प्रकारके रागमार्गके भक्त—इस प्रकार कुल मिलाकर आठ प्रकारके भेद हैं॥ 281–282 ॥ वैधीभक्तिमें उक्त चार प्रकारके भक्तोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकारके भेद, कुल मिलाकर सोलह प्रकार :- विधिभक्त्ये नित्यसिद्ध पार्षद—‘दास’। ‘सखा’, ‘गुरु’, ‘कान्तागण’,—चारिविध प्रकाश ॥ 283 ॥ साधनसिद्ध—दास, सखा, गुरु, कान्तागण। जातरति साधकभक्त—चारिविध जन ॥ 284 ॥ अजातरति साधकभक्त,—ए चारि प्रकार। विधिमार्गे भक्ते षोड़श भेद प्रचार ॥ 285 ॥ रागमयी-भक्ति भी वैधी-भक्तिकी भाँति सोलह प्रकारकी; इसलिये आत्माराम बत्तीस प्रकारके :- रागमार्गे ऐछे भक्ते षोड़श विभेद। दुइ मार्गे आत्मारामेर बत्रिश विभेद ॥ 286 ॥ अनुवाद—‘दास’, ‘सखा’, ‘गुरु’ और ‘कान्तागण’—ये चार प्रकारके विधिभक्तिके नित्यसिद्ध पार्षद हैं। विधिभक्तिके साधनसिद्ध भक्त भी दास, सखा, गुरु और कान्तागण—ये चार प्रकारके हैं। जो जातरति साधक भक्त हैं, वे भी दासादि चार प्रकारके हैं और उसी प्रकार अजातरति साधक भी दासादि चार प्रकारके हैं। इस प्रकार विधिमार्गके कुल सोलह प्रकारके भक्त हैं। इसी प्रकार रागमार्गके भी सोलह प्रकारके भक्त हैं। इन दोनों मार्गोंके कुल बत्तीस प्रकारके आत्माराम हैं॥ 283–286 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पार्षद अर्थात् नित्यसिद्ध, साधनसिद्ध, जातरतिसाधक और अजातरति-साधक—वैध और रागमार्गके भेदसे चार प्रकारके हैं। नित्यसिद्ध पार्षदगण—दास-सखा-गुरु-कान्ताके भेदसे पुनः चार प्रकारके हैं। साधनसिद्ध, जातरति साधक, अजातरति साधक, ये सब भी पुनः चार-चार प्रकारके हैं॥ 281–285 ॥ इनके साथ मुनि, निर्ग्रन्थ, च और अपिका लगना :- ‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’, ‘अपि’,—चारि शब्देर अर्थ। याँहा येइ लागे, ताहा करिये समर्थ ॥ 287 ॥ अनुवाद—‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’ और ‘अपि’—इन चारों शब्दोंके जो सब अर्थ पहले बतलाये हैं, उनकी उपरोक्त विधि और रागमार्गके बत्तीस प्रकारके आत्मारामोंके साथ जहाँ सङ्गति होती है, वैसे ही मिलाकर अर्थ करने चाहिये ॥ 287 ॥ यहाँ तक अट्ठावन प्रकारके अर्थ :- बत्रिशे छाब्बिशे मिलि’ अष्टपञ्चाश। आर एक भेद शुन अर्थेर प्रकाश ॥ 288 ॥ अनुवाद—पूर्वकथित छब्बीस अर्थोंके साथ इन । 455