श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1968
[ आयु-क्षति ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
| आयुः श्रियं यशो धर्मं 25/82 | उरुक्रमे एव भक्तिमेव 24/300 | कालवृत्त्यात्ममायायां 20/275 |
| आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म 24/153 | ऋ | कालेन वृन्दावनकेलि 19/119, 24/345 |
| आरुह्य कृच्छ्रे 24/126, 136, 25/32 | ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत 25/117 | कालेन येर्वा विमिताः 21/11 |
| आरुह्य ये द्रुमभुजान् 24/170 | ऋद्धा सिद्धिव्रज-विजयिता 19/165 | का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृत 24/52 |
| आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी 24/89 | ए | किं विधत्ते किमाचष्टे 20/147 |
| आलिलिङ्ग परिघायत 24/344 | एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना 20/110 | किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा 24/173 |
| आशाबन्धः समुत्कण्ठा नाम 23/18 | एकन्तुः महतः स्रष्टृ | कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त 20/342 |
| आसक्तिस्तद्गुणाख्याने 23/19 | एतावदेव जिज्ञास्यं 25/121 | कीर्त्त्यमानं यशो यस्य 24/93 |
| आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य 20/331 | एतावान् सर्ववेदार्थः 20/148 | कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च 21/124 |
| इ | एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल 24/171 | कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वर 22/19 |
| इति मत्वा भजन्ते मां 24/183 | एते चांशकलाः पुंसः कृष्ण 20/156 | कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा 23/61 |
| इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्द 19/229 | एते न ह्यद्भूता व्याध 22/143, 24/267 | कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति 17/140, 24/5, 25/152 |
| इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्द 23/80 | एतौ हि विश्वस्य 20/262 | कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते 19/197 |
| इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो 20/147 | एवं गुणाश्रतुर्भेदाः 23/80 | कृतिसाध्या भवेत् साध्य 22/102 |
| इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभाव 23/19 | एवंव्रतः स्वप्रियनाम 23/37, 25/135 | कृते यद्ध्यायतो विष्णुं 20/343 |
| इन्द्रारिव्याकुलं लोकं 20/156 | एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धं 19/208 | कृपामृतेनाभिषिषेच 19/119, 24/345 |
| इष्टे स्वारसिकी रागः 22/146 | क | कृष्णं स्मरन् जनश्चास्य 22/156 |
| इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो 22/57 | कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं 22/93 | कृष्णप्रियावलीमुख्या 23/86 |
| ई | कदाहं यमुनातीरे नामानि 23/33 | कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं 20/340 |
| ईश्वरः परमः कृष्णः 20/154, 21/35 | कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति 19/98 | कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानं 20/162 |
| ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु 22/70 | करुणानिकुरम्बकोमले 21/45 | कृष्णस्य पूर्णतमता 20/399 |
| उ | करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु 22/133 | कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्य 20/97 |
| उक्तार्थानामप्रयोगः 24/293 | कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे 24/209 | कृष्णादिभिर्विभावाद्यैः 23/93 |
| उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव 15/237 | कर्माणि निर्दहति किन्तु 15/170 | कृष्णाय कृष्णचैतन्याम्ने 19/53 |
| उत्सृज्यैतानथ यदुपते 22/16 | कलावप्यतिगूढेयं भक्तियेन 22/1 | कृष्णे स्वधामोपगते 24/316 |
| उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय 24/115 | कलिं सभाजयन्त्यार्या 20/345 | केचित् स्वेद्धान्तर्हृदयावकाशे 24/150 |
| उदरमुपासते य 24/160, 207 | कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति 20/342 | केशाग्रशतभागस्य 19/140 |
| उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी- 20/181 | कलौ नष्टदृशामेषः 24/316 | को वेत्ति भूमन् भगवन् 21/9 |
| उद्वाष्पः पुण्डरीकाक्ष 23/33 | कस्यान्सुभावोऽस्य न देव 24/51 | क्रमः शक्तौ परिपाट्यां 24/24 |
| उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं 19/203 | काचं विचिन्वन्नपि 22/42, 24/213 | क्रीडाकन्दुकतां येन नीतो 18/38 |
| उवाह भगवान् कृष्णः 19/205 | कामश्च दास्ये न तु 22/135 | क्व वा कथं वा कति 21/9 |
| कामादीनां कति न 22/16 | क्षतिरियमिह का मे 25/276 |
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