भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2024, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2024

[ 1/46-55पहला अध्याय7 अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीरूप गोस्वामीपर बहुत कृपा की और उनसे कहा—"तुम आओगे, —मुझे महाप्रभुने यह पहलेसे ही बता दिया था॥" 46॥ अकस्मात् श्रीहरिदासको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुका आगमन :— 'उपल-भोग' देखि' हरिदासरे देखिते। प्रतिदिन आइसेन प्रभु, आइला आचम्बिते॥ 47॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीजगन्नाथके उपलभोगको देखनेके बाद प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने आते थे, किन्तु उस दिन महाप्रभु अकस्मात् ही वहाँ आ गये॥ 47॥ श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम और महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :— "रूप दण्डवत् करे", —हरिदास कहिला। हरिदासे मिलि' प्रभु रूपे आलिङ्गिला॥ 48॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —"रूप आपको दण्डवत् प्रणाम कर रहा है।" महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके बाद श्रीरूप-गोस्वामीका आलिङ्गन किया॥ 48॥ परस्पर संलाप :— हरिदास-रूपे लञा प्रभु बसिला एकस्थाने। कुशल प्रश्न, इष्टगोष्ठी कैला कतक्षणे॥ 49॥ अनुवाद—श्रीहरिदास तथा श्रीरूपको लेकर महाप्रभु एकस्थानपर बैठ गये और उन्होंने श्रीरूपसे उनका कुशल-क्षेम पूछा तथा कुछ समय तक इष्टगोष्ठी भी की॥ 49॥ श्रीसनातनके संवादकी जिज्ञासा और श्रीरूपके द्वारा श्रीसनातनके साथ भेंट नहीं होनेके विषयमें बतलाना :— सनातनेर वार्त्ता यबे गोसाञि पुछिल। रूप कहे, —"ताँर सङ्गे देखा ना हइल॥ 50॥ उसके कारणका निर्देश :— आमि गङ्गापथे आइलाङ, तिँहो राजपथे। अतएव आमार देखा नहिल ताँर साथे॥ 51॥ श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्तिका ज्ञापन :— प्रयागे शुनिलुँ, —तेंहो गेला वृन्दावने।" अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति कैल निवेदने॥ 52॥ अनुवाद—महाप्रभुने जब श्रीसनातन गोस्वामीके विषयमें पूछा, तब श्रीरूपने कहा,—"मेरी उनके साथ भेंट नहीं हो पायी। मैं गङ्गाके पथसे प्रयागकी ओर आया और वे राजपथसे प्रयागसे ब्रजकी ओर गये, इसलिये मेरी उनसे भेंट नहीं हो पायी। मैंने प्रयागमें आकर सुना कि वे वृन्दावन गये हैं।" तत्पश्चात् श्रीरूपने महाप्रभुको श्रीअनुपमकी गङ्गा-प्राप्तिके विषयमें भी बतलाया॥ 50-52॥ महाप्रभुका प्रस्थान और उनके सङ्गी भक्तोंके साथ श्रीरूपका मिलन :— रूपे ताँहा वासा दिया गोसाञि चलिला। गोसाञिर सङ्गी भक्त रूपेरे मिलिला॥ 53॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीरूपको श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थानपर ही रहनेका निर्देश देकर चले गये। महाप्रभुके सङ्गी भक्त श्रीरूप गोस्वामीसे आकर मिले॥ 53॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'ताँहा'—श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थान अर्थात् सिद्धबकुलमें॥ 53॥ महाप्रभुके द्वारा अगले दिन भक्तोंको श्रीरूपका परिचय देना :— आर दिन महाप्रभु सब भक्त लञा। रूपे मिलाइला सबाय कृपा त' करिया॥ 54॥ अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु समस्त भक्तोंको अपने साथ लेकर आये और उन्होंने श्रीरूपपर कृपा करके उन्हें अपने सभी भक्तोंसे मिलवाया॥ 54॥ श्रीरूपके द्वारा समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना, सभीके द्वारा श्रीरूपका आलिङ्गन :— सबार चरण रूप करिला वन्दन। कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥ 55॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी