श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2062, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/10-17 दूसरा अध्याय 45
प्रभुरे देखिया याय ‘वैष्णव’ हञा। कृष्ण बलि’ नाचे सब प्रेमाविष्ट हञा ॥ 11 ॥
अनुवाद—सातों द्वीपोंके लोग, नौ खण्डोंके निवासी, देवता, गन्धर्व और किन्नर भी मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुके दर्शन करके सब वैष्णव बन जाते थे। वे ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करके प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करने लगते थे ॥ 10-11 ॥
अनुभाष्य—‘सप्तद्वीप’,—मध्यलीला 20/218 संख्याका अनुभाष्य और भागवतके पाँचवें स्कन्धके 16 और 20 अध्याय देखें।
‘नवखण्ड’,—सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायके भुवनकोशमें— “ऐन्द्रं कशेरुसकलं किल ताम्रपर्ण- मन्यद्गभस्तिमदतश्च कुमारिकाख्यम्। नागञ्च सौम्यमिह वारुणमन्त्यखण्डं गान्धर्व-संज्ञमिति भारतवर्षमध्ये॥”
- ऐन्द्र, (2) कशेरु, (3) ताम्रपर्ण, (4) गभस्तिमत्, (5) कुमारिका, (6) नाग, (7) सौम्य, (8) वारुण और (9) गान्धर्व—भारतवर्षमें ये नौ खण्ड हैं ॥ 10 ॥
महाप्रभुके आवेशका कारण, देश, काल और पात्रके वैशिष्ट्यका वर्णन :— एइमत दर्शने त्रिजगत् निस्तारि’। ये केह आसिते नारे अनेक संसारी ॥ 12 ॥ ता-सबा तारिते प्रभु सेइ सब देशे। योग्यभक्त-जीवदेहे करेन ‘आवेश’ ॥ 13 ॥
अनुवाद—इस प्रकार अपने दर्शनोंसे महाप्रभुने त्रिभुवनका उद्धार कर दिया। संसारमें फंसे अनेक लोग ऐसे भी थे जो महाप्रभुके दर्शनोंको प्राप्त नहीं कर सके। उन सबका भी उद्धार करनेके लिये महाप्रभु उन सब देशोंमें किसी योग्यभक्त-जीवकी देहमें अपना ‘आवेश’ प्रकट कर देते थे॥ 12-13 ॥
आवेशका फल :— सेइ जीवे निज भक्ति करेन प्रकाशे। ताहार दर्शने ‘वैष्णव’ हय सर्वदेशे ॥ 14 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उस जीवमें अपनी भक्तिका प्रकाश कर देते और उस जीवके दर्शनसे समस्त देशवासी वैष्णव बन जाते थे॥ 14 ॥
एइमत आवेशे तारिल त्रिभुवन। गौड़े यैछे आवेश, करि’ दिग्दरशन ॥ 15 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने आवेशके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार किया। महाप्रभुने गौड़देशमें जिस प्रकारसे आवेश प्रकाशित किया, मैं (ग्रन्थकार) यहाँ उसका दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 15 ॥
‘आवेश’का दृष्टान्त—श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका ‘आवेश’ और उनकी अवस्थाका वर्णन :— आम्बुया-मुलुके हय नकुल ब्रह्मचारी। परम-वैष्णव तेंहो बड़ अधिकारी ॥ 16 ॥
अनुवाद—गौड़देशमें श्रीनवद्वीपधामके निकट आम्बुया-मुलुकमें एक श्रीनकुल ब्रह्मचारी नामक परम वैष्णव रहते थे, जो कि भक्तिराज्यमें उत्तम अधिकारी थे॥ 16 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— ‘आम्बुया-मुलुक’,—उस समय मुलुक विभाग करके एक-एक स्थानपर यवन-राजाओंकी तहसील-कचहरी थी; ‘अम्बिका’ (वर्धमान जिलेके कालना-नगरसे संलग्न एक विशेष पल्ली)-नामक स्थानपर एक मुलुक था। उसके अधिकारमें जो स्थान अब ‘प्यारीगञ्ज’के नामसे प्रसिद्ध है, वहीं श्रीनकुल ब्रह्मचारी रहते थे॥ 16 ॥
गौड़देशे लोक निस्तारिते मन हैल। नकुल-हृदये प्रभु ‘आवेश’ करिल ॥ 17 ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुके मनमें गौड़देशके लोगोंका