श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें92 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/189-196 ] गौड़े रहिं पात्साहा-आगे आरिन्दागिरि करे। बार-लक्ष मुद्रा सेइ पात्साहारे भरे ॥ 189 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती गौड़देशमें रहता था और बादशाहके लिये वहाँसे कर-संग्रह करता था। प्रतिवर्ष बारह लाख मुद्राएँ ले जाकर गौड़देशके बादशाहके कोषमें जमा करवाना उसका दायित्व था ॥ 189 ॥ परम-सुन्दर, पण्डित, नूतन यौवन। नामाभासे 'मुक्ति' शुनि' ना हइल सहन ॥ 190 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती परम सुन्दर, विद्वान तथा नवयुवक था। 'नामाभाससे ही मुक्तिकी प्राप्ति होती हैं'-श्रीहरिदासके ये वचन सुनकर वह उसे सहन नहीं कर पाया ॥ 190 ॥ क्रोधसे भरकर श्रीठाकुरके प्रति अवज्ञापूर्ण उक्ति :- क्रुद्ध हञा बले सेइ सरोष वचन। “भावुकेर सिद्धान्त शुन, पण्डितेर गण ॥ 191 ॥ पाखण्डीका नाममें अर्थवाद :- कोटि-जन्मे ब्रह्मज्ञाने येइ 'मुक्ति' नय। एइ कहे, -नामाभास-मात्रे सेइ 'मुक्ति' हय ॥" 192 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती क्रोधित हो गया और रोषपूर्वक कहने लगा, - "हे विद्वानों, इस भावुक व्यक्तिका सिद्धान्त सुनो। करोड़ों जन्मों तक ब्रह्मज्ञानका अनुशीलन करनेसे जो मुक्ति सहज नहीं है, यह कह रहा है कि नामाभास मात्रसे ही वह मुक्ति प्राप्त हो जाती है ॥" 191-192 ॥ श्रीठाकुरके द्वारा शास्त्र-प्रमाण उद्धृत करना और प्रेमभक्ति परायणके लिये मुक्तिकी तुच्छताका वर्णन :- हरिदास कहेन, - "केने करह संशय? शास्त्रे कहे, - नामाभास-मात्रे 'मुक्ति' हय ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "आप संशय क्यों कर रहे हैं? शास्त्रोंमें कहा गया है, - नामाभास मात्रसे ही 'मुक्ति' हो जाती है ॥ 193 ॥ भक्तिसुख-आगे 'मुक्ति' अति-तुच्छ हय। अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि लय ॥ 194 ॥ अनुवाद-भक्तिके सुखके आगे मुक्ति अति तुच्छ है। अतएव भक्तगण दिये जानेपर भी मुक्ति नहीं लेते ॥ 194 ॥ हरिभक्तिसुधोदयेमें- त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे । सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो ॥ 195 ॥ अनुवाद- हे जगद्गुरो ! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है ॥ 195 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें ॥ 195 ॥ श्रीठाकुरको शपथ-प्रदान :- विप्र कहे, - "नामाभासे यदि 'मुक्ति' नय। तबे तोमार नाक काटि' करह निश्चय ॥" 196 ॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीने कहा, - "यदि नामाभाससे मुक्ति नहीं होती हो, तो मैं अवश्य ही तुम्हारी नाक काट दूँगा ॥" 196 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थमें यह बात लिखी है (चैः भाः आदिखण्ड 16/300)- "कलियुगे राक्षस-सकल विप्र-घरे। जन्मिबेक सुजनेर हिंसा करिवारे ॥" "सज्जन लोगोंके साथ हिंसा-द्वेष करनेके लिये कलियुगमें सभी राक्षस ब्राह्मण-घरमें जन्म ग्रहण करेंगे।" 'भक्तिरत्नाकर', 'नरोत्तमविलास', 'रसिकमङ्गल' आदि ग्रन्थोंकी आलोचना करनेसे भी यह जाना जाता है कि पाखण्डी लोगोंने श्रील नरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द प्रभु