भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2111

94 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/202-212 ] श्रीकृष्णसे सभीकी कुशल-याचना :- याह घर, कृष्ण करुन कुशल सबार। आमार सम्बन्धे दुःख ना हउक काहार॥" 205॥ अनुवाद-श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदार सभाके सभी सदस्यों सहित श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंमें गिर गये। श्रीहरिदास ठाकुरने मुस्कुराते हुए मधुर वचन कहे,-"आप सबका कोई दोष नहीं है, यह ब्राह्मण अज्ञानी है, इसमें इसका भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि इसका मन तर्कनिष्ठ है। नामका माहात्म्य तो तर्कके द्वारा नहीं समझा जा सकता। तर्कनिष्ठ होनेके कारण यह ब्राह्मण इन सब तत्त्वोंको कहाँसे जानेगा? आप सभी अपने घर जाइये। श्रीकृष्ण आप सबका मङ्गल करें। मेरे अपमानके विषयमें आप कुछ भी दुःख मत कीजिये॥" 202-205॥ हिरण्य-गोवर्धनका पाखण्डी ब्रह्मबन्धुके सङ्गका वर्जन :- तबे से हिरण्यदास निज-घरे आइल। सेइ ब्राह्मणे निज-द्वार माना कैल॥ 206॥ अनुवाद-तब श्रीहिरण्यदास मजुमदार अपने घर लौट आये और उन्होंने उस ब्राह्मण गोपाल-चक्रवर्त्तीको अपने घरके द्वारके भीतर आनेसे मना कर दिया॥ 206॥ नाममें अर्थवाद और वैष्णव-अवज्ञाका भीषण फल अथवा दण्ड :- तिन दिन रहि' सेइ विप्रेर 'कुष्ठ' हैल। अति उच्च-नासा तार गलिया पड़िला॥ 207॥ अनुवाद-तीन दिनोंमें ही उस ब्राह्मण गोपाल चक्रवर्त्तीको कोढ़का रोग हो गया और उसके परिणामस्वरूप उसकी अति ऊँची नाक गलकर गिर गयी॥ 207॥ चम्पक-कलि-सम हस्त-पदाङ्गुलि। कौँकड़ हइल सब, कुष्ठे गेल गलि'॥ 208॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीके हाथ तथा पैरोंकी अँगुलियाँ चम्पकपुष्पकी कलीके समान सुन्दर थी, किन्तु कोढ़के रोगके कारण वे मुड़ गयीं और धीरे-धीरे गल गयीं॥ 208॥ ठाकुरके ऐश्वर्यके दर्शनसे सभीके द्वारा उनकी स्तुति :- देखिया सकल लोक हैल चमत्कार। हरिदासे प्रशंसि' ताँरे करे नमस्कार॥ 209॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्तीकी ऐसी अवस्था देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभीने श्रीहरिदास ठाकुरके प्रभावकी प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रणाम किया॥ 209॥ भगवान् और भक्त (विष्णु और वैष्णवों)का स्वभाव :- यद्यपि हरिदास विप्रेर दोष ना लइला। तथापि ईश्वर तारे फल भुआइला॥ 210॥ अनुवाद-यद्यपि श्रीहरिदास ठाकुरने गोपाल चक्रवर्त्तीका कोई अपराध नहीं लिया, तथापि भगवान्‌से यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने उसे उसके अपराधका फल भुगवाया॥ 210॥ भक्त-स्वभाव, -अज्ञ-दोष क्षमा करे। कृष्ण-स्वभाव, -भक्त-निन्दा सहिते ना पारे॥ 211॥ अनुवाद-भक्त स्वभावतः ही अज्ञानी व्यक्तिके अपराधोंको क्षमा कर देते हैं। किन्तु श्रीकृष्णका स्वभाव ऐसा है कि वे अपने भक्तकी निन्दाको सहन नहीं कर पाते॥ 211॥ ब्रह्मबन्धुके क्लेशका श्रवण करके स्थान-त्याग और शान्तिपुरमें आगमन :- विप्र-दुःख शुनि' हरिदास मने दुःखी हैला। बलाइ-पुरोहिते कहि' शान्तिपुर आइला॥ 212॥ अनुवाद-गोपाल चक्रवर्त्ती कोढ़से कष्ट भोग रहा है, यह सुनकर श्रीहरिदास ठाकुरका मन बहुत दुःखी हुआ। श्रीहरिदास ठाकुर पुरोहित श्रीबलराम आचार्यको बतलाकर शान्तिपुर आ गये॥ 212॥