श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें130 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/181–188 ] अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“हे महाप्रभो! आपने हमें वैष्णव मानकर जो सब कहा है, मैं उसे स्वीकार नहीं करता हूँ॥ 181 ॥ अनुभाष्य—'बाह्य प्रतारणा',—वैष्णव मानकर गौरव पूर्ण स्तुति ॥ 181 ॥ स्वयंको दीन-मानकर दोनोंके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :— आमा-सब अधमे ये करियाछ अङ्गीकार। दीनदयालु-गुण तोमार ताहाते प्रचार ॥” 182 ॥ अनुवाद—हम सब अधम हैं, परन्तु आपने हमें अङ्गीकार किया है, क्योंकि आपमें दीनोंके प्रति दयालु होनेका गुण है। इस बातको सारा जगत् जानता है॥” 182 ॥ दोनोंके प्रति महाप्रभुके द्वारा यथार्थ हृदयके भावको व्यक्त करना :— प्रभु हासि' कहे,—“शुन, हरिदास, सनातन। तत्त्व कहि तोमा-विषये आमार यैछे मन ॥ 183 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा,—“हे हरिदास! हे सनातन ! मेरी बात सुनो। यथार्थमें मेरे मनमें तुम दोनोंके प्रति जो भाव है, अब मैं उसके विषयमें बतलाता हूँ॥ 183 ॥ भक्त और भगवान्का परस्पर व्यवहार :— तोमारे 'लाल्य', आपनाके 'लालक'-अभिमान। लालकेर लाल्ये नहे दोष-परिज्ञान ॥ 184 ॥ अनुवाद—मैं तुम दोनोंको अपना लालनीय (लालन-पालनके योग्य) और स्वयंको लालक (दुलार करनेवाला) मानता हूँ। लालक कभी भी लालनीयके दोषोंपर ध्यान नहीं देता ॥ 184 ॥ अनुभाष्य—जो लालक होते हैं, वे लाल्य (लालनीय)के प्रति वात्सल्यके कारण अपने लालनीयमें किसी दोषके रहनेपर भी उसे समझ नहीं पाते ॥ 184 ॥ शुद्धभक्तवात्सल्य होनेके कारण सुदर्शनधारी भगवान्में भक्तके दोष दर्शनका अभाव :— आपणारे हय मोर अमान्य-समान। तोमा सबारे करों मुञि बालक-अभिमान ॥ 185 ॥ अनुवाद—यद्यपि मैं स्वयंको सम्मानके अयोग्य मानता हूँ, तथापि तुम सबको मैं अपने बालकके समान मानता हूँ॥ 185 ॥ अनुभाष्य—मैं तुम्हारे गौरव अथवा सम्मान अर्थात् पूजाका पात्र हूँ,—यह बात भक्तप्रेमवत्सल मेरे मनमें नहीं रहती ॥ 185 ॥ मातार यैछे बालकेर 'अमेध्य' लागे गाय। घृणा नाहि जन्मे, आर महासुख पाय ॥ 186 ॥ आत्मसात् किये अपने प्रिय श्रीसनातनको महाप्रभुके द्वारा अपने समान मानना :— 'लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन-सम भाय। सनातनेर क्लेदे आमार घृणा ना उपजाय ॥” 187 ॥ अनुवाद—माताको जैसे बालकके मल-मूत्र लगनेपर भी उसमें घृणा उत्पन्न नहीं होती, अपितु महासुखकी प्राप्ति होती है। जिस प्रकार लाल्यका मल-मूत्र लालकको चन्दनकी भाँति लगता है, उसी प्रकार सनातनके शरीरसे निकलनेवाली पीबके लगनेपर मुझमें किसी प्रकारकी कोई घृणा उत्पन्न नहीं होती ॥” 186–187 ॥ अनुभाष्य—'लाल्यामेध्य',—लाल्यकी [मल-मूत्र] अपवित्र वस्तु ॥ 187 ॥ विविध घटनाओंके द्वारा श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी अतुल कृपा और भक्तवात्सल्यका वर्णन :— हरिदास कहे,—“तुमि ईश्वर दयामय। तोमार गम्भीर हृदय बुझन ना याय ॥ 188 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“आप ईश्वर हैं और हमारे प्रति दयामय हैं। आपके गम्भीर हृदयको कोई नहीं समझ सकता ॥ 188 ॥