भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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132 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/193-198 ] [अर्थात् "उस वैकुण्ठलोकमें जो वास करते हैं, उन सभीकी सच्चिदानन्द देह है। वे उस स्थानमें रहनेपर भी सच्चिदानन्दमय परम वैभव स्वरूप श्रीहरिके समान ऐश्वर्यको प्राप्तकर उस वैभवका तनिक भी आदर नहीं करते।"] (बृहद्भागवतामृतमें 2/3/139में श्रीगोपकुमारके प्रति भगवद्-पार्षदोंका वाक्य)— भक्तानां सच्चिदानन्दरूपेष्वङ्गेन्द्रियात्मसु। घटते स्वानुरूपेषु वैकुण्ठेऽन्यत्र च स्वतः॥ [अर्थात् "भक्त वैकुण्ठमें वास करें अथवा अन्य किसी स्थानपर, उनकी सच्चिदानन्दघनरूपा भक्तिके अनुरूप सच्चिदानन्दरूप देह-इन्द्रियादि स्वतः ही प्रकाशित होती हैं।"] ॥193॥ श्रीमद्भागवत (11/29/34) में— मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे। तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥194॥ अनुवाद—मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य होता है॥194॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/100 संख्या देखें॥194॥ प्राकृत अक्षजदर्शन और सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे परिचालित अप्राकृत वैष्णवाचार :- सनातनेर देहे कृष्ण कण्डु उपजाञा। आमा परीक्षिते इँहा दिला पाठाञा॥195॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने सनातनकी देहमें पीबको उत्पन्न करके उसे मेरी परीक्षाके लिये यहाँ भेजा है॥195॥ मर्त्यबुद्धिसे गुणातीत गुरु-वैष्णवोंके किसी प्रकारके दोषदर्शनसे अपराध होनेके कारण नरककी प्राप्ति :- घृणा करि' आलिङ्गन ना करिताम यबे। कृष्ण-ठाञि अपराधी हइताम तबे॥196॥ अनुवाद—मैं यदि घृणा करके सनातनको आलिङ्गन नहीं करता, तब मैं कृष्णके प्रति अपराधी बनता॥196॥ भगवत्पार्षद गुरु-वैष्णव-गौण इन्द्रिय धर्मसे अतीत वैकुण्ठ-वस्तु :- पारिषद-देह एइ, ना हय दुर्गन्ध। प्रथम दिवसे पाइलुँ चतुःसम-गन्ध॥"197॥ अनुवाद—सनातन तो कृष्णका पार्षद है, उसकी पार्षद-देहमें दुर्गन्ध हो ही नहीं सकती। पहले दिन ही आलिङ्गन करते समय मुझे सनातनकी देहसे चतुःसमकी सुगन्ध प्राप्त हुई थी॥"197॥ अनुभाष्य—पारिषद-देह ही श्रीकृष्णसेवामय देह है; प्राकृत भोगपरायण मनके द्वारा चलायमान नाकके द्वारा महाभागवत परमहंसकुलचूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीकी देह दुर्गन्धयुक्त जैसे प्रतीत होनेपर भी स्वयं महाप्रभु कह रहे हैं कि,—'कृष्णसेवापरायणताके कारण सनातनकी इस अप्राकृत पारिषद-देहमें मुझे पहले दिन ही चतुःसम अर्थात् चन्दन, कर्पूर अथवा अगरु, कस्तूरी और कुङ्कुम मिश्रित द्रव्यकी गन्ध आयी थी।' चतुःसम,–(गरुड़ पुराणमें)— “कस्तूरिकाया द्वौ भागौ चत्वारश्चन्दनस्य तु। कुङ्कुमस्य त्रयश्चैकः शशिनः स्यात् चतुःसमम्॥” अर्थात् “दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन भाग कुङ्कुम अथवा केसर और एक भाग शशी अर्थात् कर्पूर एकत्रित करके 'चतुःसम'-नामक सुगन्धित द्रव्य बनता है।" हरिभक्तिविलासमें 6/115 संख्या देखें॥197॥ महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शसे श्रीसनातनके अङ्गोंकी सुगन्ध :- वस्तुतः प्रभु यबे कैला आलिङ्गन। ताँर स्पर्शे गन्ध हैल चन्दनेर सम॥198॥