श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें136 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/221-229 ] मतोंकी कल्पना की? उसका उत्तर यह है कि हरिभक्तिविलासका मत शास्त्र-सम्मत और पूर्ण विशुद्ध होनेपर भी कर्मी लोग शुद्ध शास्त्रीय मतको त्याग करके केवलमात्र अपने-अपने प्राकृत-अशुद्ध विष्णुभक्ति विरोधी मतोंके प्रमाणोंको ही स्वीकार करते हैं। मध्यलीला 1/35 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥ आर यत ग्रन्थ कैला, ताहा के करे गणन। 'मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा'-प्रकाशन ॥ 222 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने अन्य जितने ग्रन्थोंकी रचना की, उनकी गणना कौन कर सकता है? ये ग्रन्थ श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्ददेवकी सेवाकी पद्धतिको प्रकाशित करते हैं ॥ 222 ॥ श्रीरूपका ग्रन्थ-रचना आदि कार्य :- रूप-गोसाञि कैला 'रसामृतसिन्धु' सार। कृष्णभक्ति-रसेर याँहा पाइये विस्तार ॥ 223 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसके सारस्वरूप 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थकी रचना की, जिसमें कृष्णभक्तिरसका विस्तारसे वर्णन प्राप्त होता है ॥ 223 ॥ अनुभाष्य- 'रसामृतसिन्धु',- भक्तिरसामृतसिन्धु; उज्ज्वलनीलमणि, विदग्धमाधव और ललितमाधव- मध्यलीला 1/38 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 223 ॥ 'उज्ज्वलनीलमणि'-नाम ग्रन्थ आर। राधाकृष्ण-लीलारस ताँहा पाइये पार ॥ 224 ॥ अनुवाद-उन्होंने उज्ज्वलनीलमणि नामक एक और ग्रन्थकी रचना की जिसके द्वारा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके रसको पूर्णरूपसे समझा जा सकता है ॥ 224 ॥ 'विदग्धमाधव', 'ललितमाधव',-नाटकयुगल। कृष्णलीला-रस ताँहा पाइये सकल ॥ 225 ॥ अनुवाद-उन्होंने विदग्धमाधव तथा ललितमाधव नामक दो नाटकोंकी रचना भी की जिसके द्वारा कृष्णलीला-रसको सम्पूर्ण रूपसे समझा जा सकता है ॥ 225 ॥ 'दानकेलिकौमुदी' आदि लक्षग्रन्थ कैल। सेइ सब ग्रन्थे व्रजेर रस विचारिल ॥ 226 ॥ अनुवाद-उन्होंने दानकेलि-कौमुदी आदि ग्रन्थोंमें एक लाख श्लोकोंकी रचना की। उन्होंने उन समस्त ग्रन्थोंमें व्रजरसकी ही विस्तृत व्याख्या की है ॥ 226 ॥ अनुभाष्य- 'लक्षग्रन्थ',-श्रीरूप-रचित ग्रन्थसमूहमें प्राय एक लाख श्लोक हैं; पद्यकी संख्याके अतिरिक्त गद्यकी गणना करनेकी भी प्रणाली है। लिपिकार अपने-अपने परिश्रमके परिमाणके निर्णयके समय गद्य और पद्यके श्लोकग्रन्थ (अर्थात् श्लोकों)की संख्याकी गणना करते हैं। कोई भ्रममें पड़कर ऐसा न सोचे कि श्रीरूप प्रभुने एक लाख पुस्तकोंकी रचना की थी। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “श्रीरूप-गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल।” [अर्थात् श्रीरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की।] आदिलीला 10/84 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 226 ॥ श्रीजीवका परिचय और ग्रन्थ-रचनादि-कार्य :- ताँर लघुभ्राता-श्रीवल्लभ-अनुपम। ताँर पुत्र महापण्डित-श्रीजीव-नाम ॥ 227 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई श्रीवल्लभ अथवा अनुपमके पुत्र श्रीजीव गोस्वामी महापण्डित थे ॥ 227 ॥ सर्व त्यजि' तँहो पाछे आइला वृन्दावन। तँह भक्तिशास्त्र बहु कैला प्रचारण ॥ 228 ॥ अनुवाद-सब कुछ त्यागकर श्रीजीव गोस्वामी भी श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके पीछे वृन्दावनमें आये। उन्होंने भी अनेक भक्तिशास्त्रोंकी रचना की और उनका प्रचार किया ॥ 228 ॥ 'भागवत-सन्दर्भ'-नाम कैला ग्रन्थ-सार। भागवत-सिद्धान्तेर ताँहा पाइये पार ॥ 229 ॥