श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2159, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें142 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/20-26 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन देवदासियोंके प्रति सेव्य-बुद्धि रखकर उनकी सेवा कर रहे थे और अपने आपको स्वाभाविक रूपसे उनकी दासी मान रहे थे॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राय रामानन्दने 'जगन्नाथवल्लभ' नामक एक नाटककी रचना की थी। वे उस नाटकका श्रीजगन्नाथदेवके समक्ष अभिनय करवानेके लिये दो देवकन्याओं अर्थात् नवीना देवदासियोंको (जिन्हें अब 'माहारी' कहते हैं, उन्हें) लाकर उस नाटकके अभिनय-योग्य गोपीभावकी शिक्षा दे रहे थे। वे दो कन्याएँ प्रधाना-गोपियोंकी लीलाका अभिनय करेंगी, इसलिये उनमें प्रधाना गोपियोंके रूपमें सेव्य-बुद्धि करके और स्वयंमें उनकी अनुगत दासीका भाव ग्रहण करके श्रीरामानन्द उन्हें भावी अभिनयके गीत-सेवादिकी शिक्षा दे रहे थे। श्रीरामानन्द स्वयंको श्रीमतीकी दासी जानकर श्रीमतीका अभिनय करनेवाली देवदासियोंके प्रति सेव्यबुद्धिको ग्रहण करके उनकी देहका मार्जन और मण्डनादि कर रहे थे॥ 20 ॥ गौरभक्तोंका अचिन्त्य माहात्म्य, उनमेंसे श्रीरायमें भाव-प्रेम-भक्तिकी चरम सीमा विद्यमान :— महाप्रभुर भक्तगणेर दुर्गम महिमा। ताहे रामानन्देर भाव—भक्ति-प्रेम—सीमा॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंकी महिमा अचिन्त्य है। श्रीरामानन्द रायका भाव तो प्रेमभक्तिकी भी चरम सीमा है॥ 21 ॥ श्रीजगन्नाथके सामने स्वरचित 'जगन्नाथवल्लभ'-नाटकके अभिनयके लिये जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें अभिनयकी शिक्षा देना :— तबे सेइ दुइजने नृत्य शिखाइला। गीतेर गूढ़ अर्थ अभिनय कराइला॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको नृत्य सिखाया और उसके द्वारा स्वरचित गीतके गूढ़ अर्थके अनुरूप अभिनय करनेकी शिक्षा प्रदान की॥ 22 ॥
अनुभाष्य—नाटकमें लिखित गीतके अन्तर्निहित भावोंको अभिनेत्री देवदासियोंके द्वारा अप्राकृत व्रजरस-रसिकोंके समक्ष सुन्दररूपसे प्रकाशित करना सिखलाया॥ 22 ॥ सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायि-भावेर लक्षण। मुखे-नेत्रे अभिनय करे प्रकटन॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको सञ्चारी, सात्त्विक तथा स्थायी भावके लक्षणोंको अपने मुख और नेत्रोंके अभिनयके द्वारा व्यक्त करना सिखाया॥ 23 ॥ भावप्रकटन-लास्य राय ये शिखाय। जगन्नाथेर आगे दुँहे प्रकट देखाय॥ 24 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन दोनोंको भाव-प्रकाशक स्त्री-नृत्यके विषयमें जो कुछ भी सिखलाते, वे दोनों देवदासियाँ उसे भगवान् श्रीजगन्नाथके सामने प्रकट करके दिखलातीं॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'भावप्रकटन-लास्य',—भावप्रकाश करनेवाला स्त्री-नृत्य॥ 24 ॥ भोजन पानेके बाद दोनों देवदासियोंको अज्ञानी जड़-दर्शन करनेवाले समालोचकोंके मङ्गलके उद्देश्यसे गुप्तरूपमें घरमें भेजना :— तबे सेइ दुइजने प्रसाद खाओयाइला। निभृते दुँहारे निज-घरे पाठाइला॥ 25 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको प्रसाद खिलाया और उन्हें गुप्तरूपसे उनके घर भेज दिया॥ 25 ॥ महाभागवत श्रीरायके द्वारा सिद्धदेहसे अपनी ईश्वरीकी सेवा-चेष्टा, वह तर्कपन्थी जीवोंके जड़ीय-दर्शनसे अगम्य :— प्रतिदिन राय ऐछे कराय साधन। कोन् जाने क्षुद्र जीव काँहा ताँर मन?? 26 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय प्रतिदिन उन देवदासियोंको