श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/313-316 छठा अध्याय 205 राधा-दास्यके अतिरिक्त श्रीकृष्णको भी नहीं चाहते हैं। इतने बड़े वैराग्यकी बात इस जगत्में सम्भव नहीं होती है—श्रीस्वरूपकी कृपासे अभिषिक्त एकान्त व्यक्तिके अतिरिक्त इस वैराग्यके आदर्शको अन्य कोई भी समझ नहीं सकता। जो राधादास्यके अतिरिक्त कृष्ण तकको भी नहीं चाहते हैं, वे क्या इस लोकके सामान्य वैराग्य, यश, श्री, ऐश्वर्य, वीर्य, ज्ञानके लिये यत्न करेंगे? कृष्णप्रेष्ठकी कहाँ तक सेवा करनेपर—कृष्णप्रेष्ठमें कहाँ तक प्रीतिकी पराकाष्ठा रहती है—उसका इस प्रकार विचार होता है। जैसे एक दिन श्रीचैतन्य मठमें गान हुआ था,— “तोमार गरवे गरविनी हाम, रूपसी तोमार रूपे” आदि प्राकृत सहजियागण भी ये गान गाते हैं, किन्तु इसके तात्पर्यको नहीं समझ पाते। वे लोग राइ-कानुका गान करते हैं, किन्तु उनके विचारमें त्रुटि कहाँ पर है? राइ-कानुके गानका प्रचुर साहित्य है, वह अति कर्णरसायन है, उसमें उनके मनका तर्पण हो जाता है। इस प्रकार करनेसे उनको लगता है कि वे भगवद्भक्तिकी कथाके बहुत निकट आ गये हैं, किन्तु उनका यही दोष रहता है। वे अपने स्वरूप, श्रीकृष्णके स्वरूप, श्रीकृष्णप्रेष्ठके स्वरूपकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर सकते—वे केवल आत्मेन्द्रिय-तर्पणमें ही व्यस्त हैं। इन सब गानोंसे उनकी सेवा-बुद्धि, सेव्यकी इन्द्रिय-तर्पण करनेकी चेष्टा बढ़नेके स्थानपर गानेका साहित्य, काव्य, सुर-तान-मान-लय ही इतना बढ़ जाता है कि वह उनकी सुबुद्धिको डुबो देता है। मायाकी इसी प्रकार छलना है। “गौड़ीय 39वीं संख्या” ॥313॥ दिव्यसम्बन्धज्ञानके उदित होनेसे देहात्मबुद्धिका ह्रास :— श्रीमद्भागवत (7/15/40) में— आत्मानञ्चेद्विजानीयात् परं ज्ञानधुताशयः। किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ॥314॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥314॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानके द्वारा भली-भाँति निर्मल हुए चित्तवाले व्यक्ति आत्मतत्त्वको जान लेनेपर जब सबकुछ ही प्राप्त करते हैं, तब वैसा नहीं करके पापी व्यक्ति किस अभिप्रायसे, किस कारणसे केवल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयत्न किया करते हैं? 314॥ अनुभाष्य—'किस विधिका अनुसरण करनेसे गृहस्थ सहजमें मोक्ष प्राप्त करते हैं?'—धर्मराज युधिष्ठिरके इस प्रश्नके उत्तरमें देवर्षि नारद मोक्षलक्षण सर्ववर्णाश्रम-साधनसार-वर्णन प्रसङ्गमें चारों आश्रमोंकी कथा बतलाकर अन्तमें कह रहे हैं,— चेद् (यदि) आत्मनं परं ('ब्रह्म कृष्णं') विजानीयात्, तदा ज्ञानधूताशयः (ज्ञानेन सम्बन्धज्ञानेन धूतः निरस्तः आशयः विषयकामः यस्य सः) लम्पटः (जिह्वोपस्थ-परिचालनपरः सन्) किं इच्छन् (किमर्थं) कस्य वा हेतोः देहं पुष्णाति (अनुसंचरेत्? ज्ञानिनः लौल्यमेव न सम्भवतीत्यर्थः। तथा च श्रुतिः—“आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पुरुषः। किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्चरेत्?” इति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ज्ञानीमें विषयोंके प्रति ऐसा लोभ सम्भव नहीं है। श्रुतिमें भी कहा गया है—“परब्रह्म श्रीकृष्णको जानकर भी यह पुरुष किस इच्छासे और किस कामनासे शरीरके पालनके प्रयत्न करता है?”॥314॥ दुकानदारोंके द्वारा नहीं बिकनेवाले सड़े हुए कीचड़से सने प्रसाद-अन्नको धोकर श्रीकृष्णके उच्छिष्टको चिद्वस्तु मानकर उसका सम्मान :— प्रसादान्न पसारिर यत ना बिकाय। दुइ-तिन दिन हैले भात सड़ि' याय॥315॥ सिंहद्वारे गाभी-आगे सेइ भात डारे। सड़ा-गन्धे तैलङ्गी-गाइ खाइते ना पारे॥316॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथका महाप्रसादी चावल दुकानदार बेचते हैं और जितना नहीं बिकता, वह बचा हुआ भात दो-तीन दिनके बाद सड़ जाता है। दुकानदार उस भातको सिंहद्वारके निकट तैलङ्गी गायोंके आगे