श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2224, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/325-329 छठा अध्याय 207 श्रीरघुनाथके कृष्णेन्द्रिय-प्रीति वाञ्छामय वैराग्य-दर्शनसे महाप्रभुको आनन्द :- एइमत महाप्रभु नाना लीला करे। रघुनाथेर वैराग्य देखि' सन्तोष अन्तरे ॥ 325 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते। श्रीरघुनाथ दासके वैराग्यको देखकर उनके हृदयमें बहुत सन्तोष था ॥ 325 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा रचित स्तवमें महाप्रभुकी करुणाका वर्णन :- आपन-उद्धार एइ रघुनाथदास। 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥ 326 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथने अपने उद्धारकी बातको स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है ॥ 326 ॥ श्रीगौरकृपासे श्रीरघुनाथका श्रीदामोदर-आनुगत्य और श्रीगान्धर्वा-गिरिधारीकी सेवाकी प्राप्ति :- स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तव (11)— महासम्पद्दारादपि पतितमुद्धृत्य कृपया स्वरूपे यः स्वीये कुजनमपि मां न्यस्य मुदितः। उरो गुञ्जाहारं प्रियमपि च गोवर्धनशिलां ददौ मे गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 327 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे महा-दुर्जन होनेपर भी कृपापूर्वक जो मुझे पतित देखकर मेरा सम्पत्ति और पत्नी (पाठान्तरमें विषयरूपी दावाग्नि)से उद्धार करके मुझे श्रीस्वरूपको अर्पण करके आनन्दित हुए थे, जिन्होंने मुझे अपने वक्षकी गुञ्जा-माला और गोवर्धन-शिला प्रदान की थी, वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे मत्त करें ॥ 327 ॥ छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— यः (महाप्रभुः) कृपया कुजनम् अपि मां [स्वानुकम्पया] महासम्पद्दारात् (महासम्पदश्च दाराश्च तेषां समाहारः, हिरण्ययोषित्- संसर्गात्, महासम्पद्दावात् इति पाठे महासम्पदेव दावः तस्मात् सकाशात्) उद्धृत्य स्वीये (निजजने) स्वरूपे (श्रीदामोदरस्वरूपे) न्यस्य (समर्प्य) मुदितः (हृष्टः सन्) प्रियम् अपि उरोगुञ्जाहारं (वक्षसः गुञ्जामालां) गोवर्धनशिलां च (गिरिधरविग्रहं) मे (मह्यं) ददौ, सः (गौराङ्गः गौरहरिः) मे (मम) हृदये उदयन् (प्रकटयन्) मां मदयति (हर्षयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 327 ॥ छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभु और श्रीरघुनाथके मिलनके श्रवणसे श्रीचैतन्यचरणकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ रघुनाथेर मिलन। इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 328 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ दासका महाप्रभुके साथ मिलनका वर्णन किया है। इसे जो श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 328 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 329 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीरघुनाथदासमिलनं नाम षष्ठः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 329 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीरघुनाथदासमिलन नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।