श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2320, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/104-108 ग्यारहवाँ अध्याय 303
श्रीनिवासाचार्यने पुनः श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिको प्रणाम करके जो विलाप किया, उसे सुनने मात्रसे हृदय द्रवित हो जाता है।"] ॥ 104 ॥
श्रीचैतन्यचरितसिन्धुका बिन्दु भी हृदय और कानोंके लिये रसायन :- चैतन्यचरित्र एइ-अमृतेर सिन्धु। कर्ण-मन तृप्त करे यार एकबिन्दु ॥ 106 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र तो अमृतका सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी कानों तथा मनको तृप्त कर देती है ॥ 106 ॥
महाभागवत विद्वत्-संन्यासी परमहंसवर ठाकुर-श्रीहरिदास :- महाभागवत हरिदास-परम-विद्वान्। ए सौभाग्य लागि' आगे करिला प्रयाण ॥ 105 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर उत्तम श्रेणीके भक्त अर्थात् महाभागवत तो थे ही, साथमें वे परम विद्वान् भी थे। उनका यह परम सौभाग्य था कि उन्होंने महाप्रभुके सामने उनके दर्शन करते हुए और उनका नाम लेते हुए देह त्याग दी ॥ 105 ॥
मायासे पार होकर श्रीकृष्णसेवाके इच्छुक व्यक्तिके लिये श्रीचैतन्यचरितको श्रवण करनेकी कर्त्तव्यता :- भवसिन्धु तरिवारे आछे यार चित्त। श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्यचरित ॥ 107 ॥
अनुवाद-जिसकी भवसागरसे पार होनेकी इच्छा है, वह श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यचरितका श्रवण करे ॥ 107 ॥
अनुभाष्य-'परम-विद्वान्', -जिसके द्वारा अविद्यारूपी संसार-बन्धनसे मुक्त होकर अप्राकृत अक्षर वस्तु विष्णु, अच्युत अथवा अधोक्षज-विषयक ज्ञान प्राप्त हो, वही 'विद्या' है। श्रीहरिदास ठाकुर सर्वोत्तमा कृष्णविद्यामें पारदर्शी थे, क्योंकि वे विद्यावधू-जीवन श्रीहरिनामसङ्कीर्तनके आचार्य और प्रचारकके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं; विशेषतः “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियेत भगवत्यधा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥" (भा: 7/5/24) भागवत-वाक्यमें श्रीकृष्णकी नवविधा भक्तिके मध्य सर्वश्रेष्ठ अङ्ग कीर्तनके अनुशीलनकारीको ही 'सर्वशास्त्राधीती' अर्थात् समस्त शास्त्रोंको जाननेवाला कहा गया है ॥ 105 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 108 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णनं नाम एकादशः परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 108 ॥
ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णन नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।