भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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372 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/117-120 ] आपका नृत्य देखनेके लिये आये हैं॥" 115॥ महाप्रभुका लज्जित होना और भक्तोंके साथ समुद्र स्नानके पश्चात् प्रसादका सम्मान :- लज्जित हइला प्रभु पुरीर वचने। समुद्रघाट आइला सब वैष्णव-सने ॥116॥ अनुवाद-श्रीपरमानन्द पुरीके वचनको सुनकर महाप्रभु लज्जित हो गये और वे सभी वैष्णवोंके साथ समुद्रके तटपर आ गये॥116॥ स्नान करि' महाप्रभु घरेते आइला। सबा लञा महाप्रसाद भोजन करिला ॥117॥ अनुवाद-महाप्रभु स्नान करके सभी भक्तोंके साथ अपने वासस्थानपर आ गये और सभीने साथमें श्रीजगन्नाथके महाप्रसादका भोजन किया॥117॥ महाप्रभुका अप्राकृत दिव्योन्माद-ब्रह्माके भी अगोचर :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर दिव्योन्माद-भाव। ब्रह्माओ कहिते नारे याहार प्रभाव ॥118॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके दिव्योन्माद-भावका वर्णन किया। ब्रह्मा भी उसके प्रभावका वर्णन नहीं कर सकते॥118॥ श्रीरघुनाथदासके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुकी यह लीला वर्णित :- 'चटक'-गिरि-गमन-लीला रघुनाथदास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥119॥ अनुवाद-महाप्रभुकी चटक-पर्वतकी ओर जानेकी लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥119॥ स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका आठवाँ श्लोक :- समीपे नीलाद्रेश्चटकगिरिराजस्य कलना- दये गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुमितः। व्रजन्नस्मीत्युक्तवा प्रमद इव धावन्नवधृतो गणैः स्वैर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥120॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाचलके निकट समुद्रकी बालूके द्वारा बने पर्वतरूपी चटकपर्वतको देखकर