श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2436, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसतरहवाँ अध्याय कथासार—अनेक प्रकारके प्रेमोन्मादके बीचमें रात्रिमें द्वारको नहीं खोल करके तीन प्राचीरोंको लाँघकर महाप्रभु तैलङ्गी-गायोंके बीचमें कछुएके आकारमें भूमिपर पड़े मिले थे, यही इस अध्यायमें वर्णित हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गुरुके मुखसे श्रौतपन्थायें श्रीगौरकी अप्राकृत-लीलाका वर्णन :- लिख्यते श्रीलगौरेन्दोरत्यद्भुतमलौकिकम् ।। यैर्दृष्टं तन्मुखाच्छ्रुत्वा दिव्योन्माद-विचेष्टितम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गके अतिशय अद्भुत अलौकिक दिव्योन्मादकी चेष्टा जिन्होंने (अपने नेत्रोंसे) देखी है, मैं उनके मुखसे श्रवण करके ही लिख रहा हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यैः (सौभाग्यवद्भिर्द्दामोदर-रघुनाथ-प्रमुखैः अन्तरङ्गैः भक्तैः) श्रीलगौरेन्दोः (गौरचन्द्रस्य) अद्भुतम् (अश्रुतचरम्) अलौकिकम् (अदृष्टचरं) दिव्योन्माद-विचेष्टितं (महाभावोन्मत्तेहितं) दृष्टं (प्रत्यक्षीकृतं) तन्मुखात् (तेषां श्रीगुरूणां कीर्त्तनकारिणां श्रीमुखादेव) तत् श्रुत्वा [मया] लिख्यते। श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी महाभावमें उन्मत्त चेष्टा, जो पहले कभी सुनी और देखी नहीं गयी, उसे महाप्रभुके जिन प्रमुख अन्तरङ्ग भक्त सौभाग्यवान् श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने प्रत्यक्ष देखा है, उन श्रीगुरुओंके श्रीमुखसे वर्णित उस लीलाको श्रवण करके मैं लिख रहा हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय हो और समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2 ॥ महाप्रभुका उन्माद और प्रलाप :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। उन्मादेर चेष्टा प्रलाप करे प्रेमावेशे ॥ 3 ॥ अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुकी रात-दिन चेष्टाएँ उन्मत्तकी भाँति होतीं और वे प्रेमके आवेशमें प्रलाप करते ॥ 3 ॥ महाप्रभुके तत्कालीन नित्यसङ्गी :- एकदिन प्रभु स्वरूप-रामानन्द-सङ्गे। अर्द्धरात्रि गोञाइला कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 4 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके साथ आनन्दपूर्वक कृष्णलीलाके आस्वादनमें आधी रात व्यतीत कर दी॥ 4 ॥ भाव-उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपकी महाप्रभु-सेवा :- यबे येइ भाव प्रभु करये उदय। भावानुरूप गीत गाय स्वरूप-महाशय ॥ 5 ॥ अनुवाद—महाप्रभुमें जब जिस प्रकारका भाव उदित होता, तब श्रीस्वरूप दामोदर उनके भावके अनुरूप गीत गाते ॥ 5 ॥ महाप्रभुके प्रिय ग्रन्थसे श्रीरायके द्वारा श्लोकका पाठ :- विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीतगोविन्द । भावानुरूप श्लोक पड़ेन राय-रामानन्द ॥ 6 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय भी महाप्रभुके भावोंके अनुरूप श्रीविद्यापति, श्रीचण्डीदास और श्रीगीतगोविन्दके श्लोक पढ़ते ॥ 6 ॥