श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2460, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/95-99 अठारहवाँ अध्याय 443 अचेतन थे; चक्रवाकके सचेतन होनेपर भी (अचेतन) नीलकमल उन चक्रवाकोंका आस्वादन करने लगे। इसमें विपरीत धर्म यह है कि साधारणतः चक्रवाक पक्षी ही कमलका आस्वादन करता है; परन्तु कृष्णकी इस लीलामें अचेतन कमलने ही सचेतन चक्रवाकका आस्वादन किया। सूर्यमित्र कमल सहजरूपमें ही चक्रवाकके साथ रहनेवाला है, किन्तु मित्र होनेपर भी वह चक्रवाकको लूट लेता है। उत्पल अर्थात् कुमुद रात्रिमें प्रस्फुटित होता है, इसलिये वह चक्रवाकका अपरिचित शत्रु है। ऐसा होनेपर भी गोपियोंके हस्तरूपी वह कुमुद अपने स्तनरूपी चक्रवाककी रक्षा करता है; — यह बहुत ही विचित्र है, अतएव यहाँपर 'विरोधासङ्कार' है॥ 95-98 ॥ अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-सूर्योदयसे कमलके प्रस्फुटित होनेके कारण सूर्य कमलका मित्र है। सूर्यके उदित होनेपर (सूर्यसे) चक्रवाकका मिलन होता है। किन्तु यहाँपर कमल सूर्यका मित्र होनेपर भी अपने-मित्र सूर्यके मित्र चक्रवाकको लूट रहा है। चक्रवाक चेतन है और कमल अचेतन पदार्थ है। किन्तु यहाँपर कृष्ण-हस्तरूपी कमल अचेतन होनेपर भी गोपियोंके वक्षरूपी सचेतन चक्रवाकपर आक्रमण कर रहे हैं, —यही 'विरोधाभासालङ्कार' है। सूर्योदयके समय कुमुद बन्द हो जाता है, इसलिये सूर्य कुमुदका शत्रु है। रात्रिमें कुमुद प्रस्फुटित होता है, इसलिये वह चक्रवाकसे अपरिचित है। यहाँपर सूर्य कुमुदका शत्रु है और चक्रवाक उस शत्रुका (सूर्यका) मित्र है। गोपीवक्षरूपी चक्रवाक ही यहाँपर गोपियोंके हस्तरूपी कुमुदके द्वारा रक्षित है, — यह भी विचित्र 'विरोधासङ्कार' है ॥ 95-98 ॥ अतिशयोक्ति, विरोधाभास, दुइ अलङ्कार प्रकाश, करि' कृष्ण प्रकट देखाइल। याहा करि' आस्वादन, आनन्दित मोर मन, नेत्र-कर्ण-युग्म जुड़ाइल ॥ 99 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति' और 'विरोधाभास', — इन दोनों अलङ्कारोंको एक साथ प्रकटित करके दिखलाया जिसका आस्वादन करके मेरा मन आनन्दित हो गया और मेरे नेत्र और कान सुशीतल हो गये॥ 99 ॥ अनुभाष्य— 'अतिशयोक्ति',— उपमेय (जिसकी किसी वस्तुसे उपमा दी गयी हो) पदार्थके स्थानपर उपमान (वह वस्तु जिससे उपमा दी जाय) को अभिन्न समझकर व्यवहार करनेसे वह — 'अतिशयोक्ति-अलङ्कार' कहलाता है; जैसे साहित्यदर्पण (10/693) कारिकामें— “सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।" [अर्थात् “अध्यवसायके (अभेद-प्रतिपादनके) अर्थात् उपमेय और उपमानके एक ही भावकी सिद्धि होनेपर, उस स्थानपर 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कार कहा जाता है (अर्थात् उपमेय-रूपी गोपीवक्षके उपमान-'चक्रवाक' और उपमेय-रूपी श्रीकृष्णहस्तके उपमान-'नीलकमल' एवं उपमेय-रूपी गोपीहस्तके उपमान-'रक्तकमल' हैं। उपमेय-विषयका निर्देश नहीं करके उपमानको ही अभिन्न-विचारसे उपमेय-रूपमें स्थापन करनेको अतिशयोक्ति अलङ्कार कहते हैं। यहाँपर उपमान— 'चक्रवाक', 'नीलकमल' और 'रक्तकमल'को यथाक्रम उपमेय—गोपीवक्ष, श्रीकृष्णहस्त और गोपीहस्तके साथ अभेद प्रतिपादित करवाकर श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कारको साक्षात् प्रकट करके दिखलाया है) ।"] 'विरोधाभास',— जैसे काव्यप्रकाश (10/24) में— “विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः । जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैर्विरुद्धाः स्युर्गुणास्त्रिभिः । क्रियाद्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश॥” [अर्थात् “अविरोध होनेपर भी विरुद्धरूपी जो वाक्य है, वह 'विरोध' है; चार प्रकारकी जाति, तीन प्रकारके गुण, दो प्रकारकी क्रिया और द्रव्य—इन भेदोंसे विरोध दस प्रकारका है।"] ॥ 99 ॥