श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2463, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें446 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/110-117 ] वृन्दावन, कृष्ण और गोपियाँ कहाँ गये, तुम लोगोंने मेरे कृष्णनाम लइते तोमार ‘अर्द्धबाह्य’ हइल। उस सुखको भङ्ग कर दिया!” 109 ॥ ताते ये प्रलाप कैला, ताहा ये शुनिल॥” 116 ॥ अर्द्धबाह्यसे बाह्यदशामें आगमन, श्रीस्वरूपसे कारणकी जिज्ञासा, श्रीस्वरूपका उत्तर :- एतेक कहिते प्रभुर केवल ‘बाह्य’ हैल। स्वरूप-गोसाञिरे देखि' ताँहारे पुछिल ॥ 110 ॥ “इँहा केने तोमरा आमारे लञा आइला?” स्वरूप-गोसाञि तबे कहिते लागिला ॥ 111 ॥ “यमुनार भ्रमे तुमि समुद्रे पड़िला। समुद्रेर तरङ्गे आसि' एतदूर आइला! ! 112 ॥ एइ जालिया जाले करि' तोमा उठाइल। तोमार परशे एइ प्रेमे मत्त हइल ॥ 113 ॥ सब रात्रि सबे बेड़ाइ तोमारे अन्वेषिया। जालियार मुखे शुनि' पाइनु आसिया ॥ 114 ॥ तुमि मूर्च्छा-छले वृन्दावने देख क्रीड़ा। तोमार मूर्च्छा देखि' सबे मने पाय पीड़ा ॥ 115 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते हुए महाप्रभु पूर्ण बाह्यदशामें आ गये। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको देखकर उनसे पूछा, — “तुम लोग मुझे यहाँ लेकर क्यों आ गये?” तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी बतलाने लगे,—“आप यमुनाके भ्रमसे समुद्रमें जा पड़े थे। आप समुद्रकी तरङ्गोंपर बहते हुए इतनी दूर आ गये थे। इस मछुवारेने आपको जालके द्वारा समुद्रसे निकाला है। आपके स्पर्शसे यह मछुआरा प्रेममें मत्त हो गया है। सारी रात सभी भक्त घूम-घूमकर आपको ढूँढ़ते रहे। मछुवारेके मुखसे आपके विषयमें सुनकर आप हमें यहाँपर मिले। आप तो मूर्च्छाके छलसे वृन्दावनमें लीला देख रहे थे, किन्तु आपको मूर्च्छित देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत कष्ट हो रहा था। हमारे द्वारा कृष्णनाम कीर्तन करनेपर आपकी ‘अर्द्धबाह्य’ दशा हुई, उस अवस्थामें आपने जो प्रलाप किया, उसे भी हम सबने सुना॥” 110-116 ॥