भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2520

[ 20/158 बीसवाँ अध्याय 503

[चार सौ उनतीस चैतन्याब्द त्रिविक्रम मासमें ज्येष्ठके इकतीसवें दिन, श्रीनवद्वीप मण्डलके अन्तर्गत मायापुरमें श्रीशचीनन्दन गौरहरिके जन्मस्थानके निकट श्रीव्रजपत्तन (मूलमठ श्रीचैतन्य मठ)में रहकर 'गौरहरि' बोलते हुए इस समय कुलियामें वास कर रहे श्रीगौरकिशोर दास बाबाजी महाराजके अयोग्य दास इस दयितदास नामक नराधमने श्रीचैतन्यचरितामृतके 'अनुभाष्य'के लेखनको सम्पूर्ण किया है।]

आजि एइ सुख-दिने, भकतिविनोद बिने, सुखवार्त्ता जानाब काहारे? 'अनुभाष्य' शुनि' येइ, परम प्रफुल्ल हइ' उरुकृपा वितरिल मोरे॥३॥

[आज इस परम सुखके दिनमें श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके प्रकट रूपमें विद्यमान नहीं रहनेके कारण मैं इस सुखवार्त्ताको किसको कहूँ? (आंशिक) 'अनुभाष्य'को सुनकर वे परम आनन्दित हुए थे और उन्होंने मुझपर प्रचुर कृपाका वितरण किया था।]

ताँहार करुणा-कथा, माधव-भजन-प्रथा, तुलना नाहिक त्रिभुवने। ताँर सम अन्य केह, धरिया ए नरदेह, नाहि दिल कृष्णप्रेमधने॥४॥

[उनकी करुणाकी बात और उनके माधव-भजनकी प्रथाकी इन तीनों लोकोंमें तुलना नहीं है। उनके समान अन्य किसीने भी इस मनुष्य देहको धारणकर श्रीकृष्णप्रेम रूपी धनका वितरण नहीं किया है।]

सेइ प्रभु-शक्ति पाइ', एबे 'अनुभाष्य' गाइ, इहाते आमार किछु नाइ। यावत् जीवन रबे, तावत् स्मरिब भवे, नित्यकाल सेइ पद चाइ॥५॥

[उन प्रभुसे शक्तिको प्राप्तकर ही मैंने अब 'अनुभाष्य'का लेखन कार्य किया है, इसमें मेरी कुछ भी योग्यता नहीं है। जब तक जीवन रहेगा, तब तक मैं भावमें विभोर होकर उनका स्मरण करूँगा और नित्यकालके लिये मैं उन श्रीचरणकमलोंको चाहता हूँ।]

गदाधर-मित्रवर, श्रीस्वरूप-दामोदर, सदा काल गौर-कृष्ण यजे। जगतेर देखि' क्लेश, धरिया भिक्षुक-वेश, अहरहः कृष्णनाम भजे॥६॥

[श्रीगदाधर पण्डितके मित्रवर श्रीस्वरूप दामोदर सब समय श्रीगौर-कृष्णका यजन करते हैं। वे जगत्के जीवोंके क्लेशोंको देखकर भिक्षुक-वेश धारण करके दिन-रात श्रीकृष्णनामका भजन करते हैं।]

श्रीगौर-इच्छाय दुइ, महिमा कि कब मुइ, अप्राकृत-पारिषद-कथा। प्रकट हइया सेवे, कृष्ण-गौराभिन्न-देवे, अप्रकाश्य कथा यथा तथा॥७॥

[श्रीगदाधर पण्डित और श्रीस्वरूप दामोदर-इन दोनों अप्राकृत-पार्षदोंकी महिमाका मैं क्या वर्णन करूँ? श्रीगौरसुन्दरकी इच्छासे ये दोनों इस जगत्में प्रकटित होकर श्रीकृष्णसे अभिन्न भगवान् श्रीगौरसुन्दरके निगूढ़ चरित्रको यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकाशित कर रहे हैं।]

श्रीगौराङ्ग-निजजन, भकतिविनोद-गण, अप्राकृत-भावे याँर स्थिति। 'अनुभाष्य' सयतने, पाठ कर भक्त-सने, लाभ कर युगल-पीरिति॥८॥

[श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके निजजन श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके गणोंकी अप्राकृत-भावमें स्थिति है। हे पाठको! श्रीचैतन्यचरितामृतके अनुभाष्यका ध्यानपूर्वक भक्तोंके सङ्गमें पाठ करके श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलके प्रेमको प्राप्त करो।] ॥ 158 ॥

श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थका अनुभाष्य समाप्त।

॥ अन्त्यलीला समाप्त ॥