श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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506 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला क्व-नाम्न ]
| कॉलम १ | कॉलम २ | कॉलम ३ | |||
|---|---|---|---|---|---|
| क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व | 19/35 | तच्चेद्देह-द्रविण-जनता-लोभ | 3/60 | दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः | 1/6 |
| क्व मे कान्तः कृष्ण | 16/87 | तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो | 9/77 | दीयमानं न गृह्णन्ति बिना | 3/187 |
| क्व रासरसताण्डवी क्व सखि | 19/35 | तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरली | 1/79, 114 | दुर्गमे कृष्णभावाब्धौ निमग्ना | 15/1 |
| ग | तदपि भजसि शश्वच्चुम्बन | 1/163 | दुर्गमे पथि मेऽन्धस्य स्खलत्पाद | 1/2 | |
| गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः | 7/41 | तदमलपदपद्मे भृङ्गतामेत्य | 20/154 | देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे | 5/123 |
| गन्धर्वपालिभिरणुद्रुत | 18/25 | तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो | 4/194 | देहापाताद्वन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे | 4/1 |
| गिरिधरचरणाम्भोजं | 20/156 | तद्वा इदं भुवनमङ्गल | 5/125 | दैन्यार्णवे निमग्नोऽहं चैतन्य | 5/1 |
| गूढ़ग्रहा रुचिरया सह | 1/136 | तनुद्यत्सङ्कोचात् कमठ इव | 17/72 | दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां | 1/150 |
| गृहान्तःखेलन्त्यो निजसहज | 1/153 | तमालश्यामलत्विषि श्रीयशोदा | 7/82 | द्रुतः गच्छन् द्रष्टुं प्रियमिति | 16/87 |
| गृहीतकापालिकधर्मको | 14/41 | तमालस्य स्कन्धे सखि कलित | 1/146 | ध | |
| गोप्यः किमाचरदयं कुशलं | 16/140 | तयोर्मध्ये हीरोज्ज्वलविमल | 1/161 | धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्या | 19/105 |
| गौरेण हरिणा प्रेममर्यादा | 15/1 | तरणिरिव तिमिरजलधिं जयति | 3/180 | धरीज पडिच्छन्दगुणं सुन्दर मह | 1/144 |
| च | तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स | 16/25 | धर्मः सोऽपि महान्मया न | 1/152 | |
| चरितममृतमेतच्छ्रीलचैतन्य | 20/154 | तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम | 5/125 | धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन | 5/10 |
| चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं | 14/53 | तस्य हरेः पदकमलं वन्दे | 1/212 | न | |
| चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ता | 12/1 | तह तह रुन्धसि बलिजं जह | 1/144 | न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो | 8/65 |
| चिरमखिलसुहृच्चकोरनन्दी | 1/175 | तांश्चाकृतार्थान् वियुनङक्ष्यपार्थकं | 19/45 | न चैवं विस्मयः कार्यो भवता | 3/83 |
| चूतप्रियाल-पनसासन | 15/32 | ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्ग | 18/25 | नटता किरातराजं निहत्य | 1/184 |
| चेतःप्राङ्गणसङ्गिनी विजयते | 1/99, 120 | तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्यमाणश्च | 15/81 | नदज्ज्वलदनिखनः श्रवण | 17/40 |
| चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्नि | 20/12 | तुण्डे ताण्डविनी रतिं | 1/99, 120 | न धनं न जनं न सुन्दरीं | 20/29 |
| चैतन्यचरणाम्भोजमकरन्दलिहो | 7/1 | तृणादपि सुनीचेन | 6/239, 20/21 | नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं | 7/34 |
| चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्य | 20/155 | तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं | 7/40 | न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां | 7/43 |
| ज | तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या | 16/27 | न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः | 16/25 | |
| जगमोहन-परिमूण्डा याङ् | 10/68 | त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च | 7/33 | नवाम्बुद-लसद्द्युतिर्नव | 15/63 |
| जङ्घाधस्तटसङ्गदक्षिणपदं | 1/166 | त्रैलोक्य-सौभगमिदञ्च निरीक्ष्य | 17/31 | नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद | 16/52 |
| जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम | 1/5 | त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्ध | 3/195 | नमामि हरिदासं तं चैतन्यं | 11/1 |
| जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोक | 6/137 | त्वमेवेति द्वाराधिपमभिवदन्कुम्मद | 16/87 | नयनं गलदश्रुधारया वदनं | 20/36 |
| ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो | 4/178 | द | न साधयति मां योगो न | 4/59 | |
| ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा | 7/27 | दृष्ट्रि | 3/56 | न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा | 4/59 |
| त | दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं | 15/70 | नातः परं परम यद्भवतः | 5/124 | |
| तं निर्व्याजं भज गुणनिधे | 3/62 | दधद्भिन्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण | 19/76 | नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति | 8/65 |
| तं वन्दे कृष्णचैतन्यं | 8/1 | दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं | 13/1 | नाम्नैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं | 3/60 |
| दशां कष्टामष्टापदमपि | 1/169 | नाम्नामकारि बहुधा निज | 20/16 |