श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ नैमि-प्राकृ शब्दकोश 529
नैमित्तिक—निमित्तसे उत्पन्न नैरन्तर्य—निरन्तर होनेका भाव नैर्घृण्य—निर्ममता, क्रूरता प पक्षान्तर—दूसरी ओर पन्था—पथ परिज्ञात—अच्छे प्रकारसे ज्ञात परिनिष्ठित—दूसरेमें निष्ठावाला परदार—दूसरेकी स्त्री परवर्ती—बादमें पराक्रान्त—शक्तिशाली परिग्रह—ग्रहण पराभक्ति—श्रेष्ठा, शुद्धा भक्ति पराभूत—पराजित परिचर्या—सेवा परिचालक—चलानेवाला परिदृष्ट—दृष्ट परिनिष्ठित—पूर्णतया निपुण परिमित—सीमित परिलक्षित—अच्छी तरह देखाभाला हुआ परिव्राजक—संन्यासी परिवेष्टित—घिरा हुआ पर्यन्त—तक पर्यवसित—समाप्त पाण्डित्य—विद्वता पारत्रिक—परलोक-सम्बन्धी पारलौकिक—परलोक-सम्बन्धी पार्षद—परिकर पाषण्डी—पाखण्डी पूर्वपक्ष—संशयके सम्बन्धमें उठाया गया प्रश्न पूर्वराग—मिलनसे पहलेका राग प्रकरण—निर्माण, प्रसङ्ग प्रकृत—यथार्थ प्रकृष्ट—उत्तम प्रक्षिप्त—बादमें जोड़ा या घुसाया हुआ
प्रच्छन्न—ढका हुआ प्रजल्प—इधर-उधरकी बात प्रज्ञा—बुद्धि प्रणयन—रचना, निर्माण प्रणत—शरणागत प्रणतपाल—शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रणति—प्रणाम, शरणागति प्रताड़ित—सताया गया प्रतिपादित—प्रमाणित प्रतिपाद्य—जिसे प्रमाणित किया जाय प्रतिभात—प्रभावयुक्त, ज्ञात प्रतीयमान—जान पड़ता हुआ, जिसकी प्रतीति हो रही हो प्रत्यगात्मा—जीवात्मा प्रत्यवाय—दोष प्रत्याहार—निरोध, रोकना प्रत्युपकार—भलाईके बदलेमें की हुई भलाई प्रदत्त—दिया हुआ प्रधान—मायाकी एक वृत्ति प्रधानतः—मुख्यरूपसे प्रपत्ति—शरणागति प्रभूत—अत्यधिक प्रभृति—जैसा प्रयोजनीयता—आवश्यकता प्रयोजक—प्रयुक्त करनेवाला प्रयोजकत्व—प्रयोजक होनेका भाव प्रवर—श्रेष्ठ प्रवर्त्तक—किसी काममें लगानेवाला, आरम्भ करनेवाला प्रवृत्ति—मनका किसी विषयकी ओर झुकाव, प्रभाव प्रशस्त—प्रशंसाके योग्य प्रशान्तात्मा—शुद्ध या शान्त आत्मा प्रशामक—शान्त करनेवाला प्राकृत—प्रकृति-सम्बन्धी