श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/४१-४८ ] यथा मृद्घटयोः। न ह्यसत्यतिशये कार्यं कारणमित्यवकल्पते। न च पञ्चरात्रसिद्धान्तिष्वेकैकस्मिन् सर्वेषु वा ज्ञानैश्वर्यादितारतम्यकृतः कश्चिद्भेदोऽभ्युपगम्यते। वासुदेवा एव हि सर्वे व्यूहा निर्विशेषा इष्यन्ते। न चैते भगवद्व्यूहाश्चतुःसंख्यायामेवावतिष्ठेरन्, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य समस्तस्यैव जगतो भगवद्व्यूहत्वावगमात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंका इस प्रकार अभिप्राय भी हो सकता है कि उक्त सङ्कर्षणादि जीव-कोटि नहीं हैं; वे लोग सभी ईश्वर, सभी ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्तियुक्त, बल, वीर्य और तेजःसम्पन्न, सभी वासुदेव, सभी निर्दोष, निराधिष्ठित, निरवद्य हैं। इसलिये उनके सम्बन्धमें उत्पत्त्यसम्भव-दोष नहीं है। इस अभिप्रायके ऊपर यह कह सकते हैं—इस प्रकारका अभिप्राय रहनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषका निवारण नहीं होता है, क्योंकि यह दोष दूसरे प्रकारसे रह जाता है। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं; किन्तु सभी समधर्मी और ईश्वर हैं। यह अर्थ अभिप्रेत होनेपर अनेक ईश्वरोंको स्वीकार करना होगा। अनेक ईश्वर स्वीकार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि एक ईश्वरके द्वारा ही ईश्वर-कार्य सिद्ध (सम्पादन) हो जाता है। और भी भगवान् वासुदेव एक अर्थात् अद्वितीय और परमार्थ-तत्त्व हैं, इस प्रकार प्रतिज्ञा रहनेसे सिद्धान्तहानिका दोष भी जुड़ जाता है। अभिप्राय यह है—यह चतुर्व्यूह एकमात्र भगवान्का ही है और वे सभी समधर्मी हैं। ऐसा होनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषसे बचा नहीं जा सकता, क्योंकि वे किसी प्रकार एक-दूसरेसे कम या अधिक नहीं होनेपर वासुदेवसे सङ्कर्षणका, सङ्कर्षणसे प्रद्युम्नका और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म नहीं हो सकता है। कार्य-कारणमें कोई वैशिष्ट्य होता है, यह स्वीकार करना होगा। जिस प्रकार मिट्टी (कारण) से घड़ा (कार्य) बनता है। दोनोंमें तारतम्य ना रहनेसे कौन कार्य है, कौन कारण है, यह निर्देश नहीं किया जा सकता। और भी देखें, पञ्चरात्र-सिद्धान्ती लोग वासुदेवादिके ज्ञानादि तारतम्यकृत किसी भेदको नहीं मानते, अपितु चतुर्व्यूहको एकमात्र वासुदेव ही मानते हैं। तो भगवान्के व्यूह क्या चार ही पर्याप्त हैं? अवश्य ही ऐसा नहीं है। ब्रह्मादिसे लेकर घासके तिनके तक समुदाय जगत् सभी भगवत्-व्यूह हैं—यह श्रुति और स्मृति, दोनोंके द्वारा प्रमाणित हुआ है।” विप्रतिषेधाच्च’ (सूत्र ४५, शङ्करभाष्य)—“विप्रतिषेधश्चास्मिन् शास्त्रे बहुविध उपलभ्यते गुणगुणित्व-कल्पणादिलक्षणः। ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजांसि गुणाः, आत्मान एवैते भगवन्तो वासुदेवा इत्यादिदर्शनात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंकी पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें गुण और गुणी आदिमें अनेक प्रकारसे विरोधी कल्पना दिखायी देती है। स्वयं ही गुण और स्वयं ही गुणी, यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। वे कहते हैं कि ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्ति, बल, वीर्य और तेज, ये सब गुण हैं, प्रद्युम्नादि भिन्न होनेपर भी ये आत्मा और भगवान् वासुदेव हैं।” श्रीपाद शङ्कराचार्यके मतवादके उत्तरमें श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें (चतुर्व्यूह-वर्णन- प्रसङ्गमें ८०-८३ श्लोकमें)— “महावस्थाख्यया ख्यातं यद्व्यूहानां चतुष्टयम्। तस्याद्योहयं तथोपास्यश्चित्ते तदधिदैवतम्। तथा विशुद्धसत्त्वस्य यश्चाधिष्ठानमुच्यते॥ निजांशो यस्य भगवान् श्रीसङ्कर्षण इष्यते। यस्तु सङ्कर्षणो व्यूहो द्वितीय इति सम्मतः। जीवश्च स्यात् सर्वजीवप्रादुर्भावास्पदत्वतः॥ पूर्णशारद-शुभ्रांशुपरार्द्धमधुरद्युतिः। उपास्योऽयमहाङ्कारे शेषन्यस्तनिजांशकः॥ स्मराारातैरधर्मस्य सर्वान्तकसुरद्विषाम्। अन्तर्यामित्वमास्थाय जगत्संहारकारकः॥ व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नो विलासे यस्य पाँचवाँ अध्याय | २७३