श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६/७७-७९ “नियतिः सा रमादेवी तत्प्रिया तद्वशं तदा। तल्लिङ्गं भगवान् शम्भुर्ज्योतीरूपः सनातनः। या योनिः सा पराशक्तिः” इत्यादि। श्रीरुद्रके एकादश व्यूह—अजैकपात्, अहिर्ब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, देवश्रेष्ठ त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित; और इन विस्तारोंके अतिरिक्त उनके आठ रूप (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी) हैं। इसमेंसे प्राय सभी रुद्र ही पाँच मुख, तीन नेत्र और दस भुजाओंवाले हैं। कहीं-कहीं रुद्रको भी ब्रह्माकी भाँति ‘जीवविशेष’ कहा गया है। भगवत्-अंश कहनेपर ‘शेष’ की भाँति इनकी भी मीमांसा करनी होगी अर्थात् स्वांश शिव ईश्वर-श्रेणीमें आते हैं और संहारक रुद्र विभिन्नांश जीव हैं। भगवदावतार ‘हर’ पुरुषात्मस्वरूप कहे जाते हैं और वे वस्तुतः निर्गुण होकर भी तमोगुणके योगसे तत्त्वको ना जाननेवाले साधारण लोगोंको आपाततः विकारीकी भाँति प्रतीत होते हैं। जैसे दशम स्कन्धमें कहा गया है—“रुद्र निरन्तर गुणसाम्यावस्थरूप प्रकृतिसे युक्त हैं, गुणोंमें क्षोभ होनेके बाद वे तीन गुणोंसे युक्त और दूरसे तीन गुणोंसे संवृत होते हैं।” जैसे ब्रह्मसंहितामें—“जिस प्रकार दूध विकारविशेषके योगसे दहीके रूपमें परिणत होता है, किन्तु वह दही अपने कारण दूधसे कभी भी पृथक् वस्तु नहीं है, वैसे ही जो संहारकार्यके लिये रुद्ररूपमें अवतीर्ण होते हैं, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ।” किसी कल्पमें ब्रह्माके ललाटसे अथवा किसी कल्पमें विष्णुके ललाटसे रुद्रकी उत्पत्ति होती है। कल्पके अन्तमें सङ्कर्षणसे भी कालाग्नि रुद्रका जन्म होता है। वायुपुराणादिमें वैकुण्ठस्थित शिवलोकको सर्वकारणस्वरूप कहा गया है और वहाँ तमोगुण-सम्बन्धरहित जो ‘सदाशिव’-नामक शिवमूर्ति प्रदर्शित हुई है, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके विलास हैं। जैसे ब्रह्मसंहितामें आदिशिव-कथनमें वर्णन हुआ है—“चित्-शक्तिरूपा रमादेवी ही नियतिरूपा हैं और वे जिन भगवान्की प्रिया और वशीभूता हैं, उन स्वयंरूपके एक अङ्गविशेष सनातन चैतन्यविग्रह भगवान् शम्भु हैं। उनकी सङ्गिनी महामाया अर्थात् योनि रमादेवीका विस्तार हैं और वे महदादि-तत्त्वका उत्पत्ति स्थान हैं तथा अपरा अर्थात् त्रिगुणमयी शक्ति हैं।” आदि श्रीबलदेव विद्याभूषण :- वाक्यविशेषलाभात् रुद्रस्यापि द्वैविध्यं प्रतिपादयितुमाह—श्रीति। ‘सत्त्वं रजः’ इत्यादि (भाः १/२/२३) वाक्ये य ईश्वरकोटिरुक्तः, तं तावदाह—रुद्र एकादशव्यूह इति। अत्र भारतवाक्यम्—“अजैकपादहिर्ब्रध्नो विरूपाक्षोऽथ रैवतः। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः। सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥” इत्येतत्। तथाष्टतनुरिति—“पृथिवीं सलिलं तेजो वायुराकाशमेव च। सूर्यचन्द्रमसौ सोमयाजी चेत्यष्टमूर्त्तयः॥” इति यादवः। प्रायः इति—जलावरणस्थ-रुद्रस्यैकमुखत्ववीक्षणात्। अथ जीवकोटित्वं तस्याह—क्वचिदिति। “यं कामये तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्” इत्यादिकमृक्श्रुतौ; “अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत—प्रजाः सृजेय” इत्यारभ्य, “नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् रुद्रो जायते, नारायणात् प्रजापतिर्जायते, नारायणादिन्द्रो जायते, नारायणोऽष्टौ वसवो (जायन्ते), नारायणादेकादश-रुद्रा (जायन्ते) नारायणाद्द्वादशादित्याः” (नाः उः १) इत्यादिकं नारायणोपनिषदि। “एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानः” इत्युपक्रम्य, “तस्य ध्यानान्तस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषोऽजायत विभ्रच्छ्रि ३६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत