श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 536, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय— 219-269 महाप्रभुकी यौवन लीलाका वर्णन—महाप्रभुका गया गमन, श्रीईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय, प्रेमप्रकाश, घरमें लौटना, शचीमाताको प्रेमदान, श्रीअद्वैत-मिलन, श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन, श्रीवासके द्वारा महाप्रभुका अभिषेक, श्रीनित्यानन्द-मिलन, निताइको महाप्रभुके द्वारा षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूपका प्रदर्शन, श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा व्यास-पूजन, महाप्रभुका श्रीनित्यानन्द (श्रीबलदेव) के आवेशमें मूसल धारण, शचीदेवीका श्रीबलराम-कृष्ण-दर्शन, जगाइ-मधाइका उद्धार, महाप्रभुका सात-प्रहरिया भाव, मुरारिके भवनमें वराह आवेश, शुक्लाम्बरके भिक्षाके चावल खाना, 'हरेर्नाम' श्लोककी व्याख्या, नामग्रहण करनेकी प्रणाली, श्रीवास भवनमें एक वर्ष तक सङ्कीर्तन, गोपाल-चापालका उपाख्यान, दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप देना, मुकुन्दके प्रति महाप्रभुका दण्डरूपी अनुग्रह, श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुकी दण्डरूपी कृपा, मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिक रामनिष्ठा, श्रीधरके लोहेके पात्रमें जलपान और उनको वरदान, हरिदास ठाकुरके प्रति कृपा, श्रीअद्वैताचार्यके प्रति शचीदेवीके अपराधका खण्डन, पाषण्डी छात्रका 'नाममें अर्थवाद', नामापराधीके मुख दर्शन होनेपर मनुष्यका कर्त्तव्य, महाप्रभुके द्वारा अभिधेय भक्तिकी महिमाका व्याख्यान, मुरारिकी प्रशंसा, आम्रवृक्ष-रोपण और फल दानकी कहानी, कीर्तनके समय मेघोंका निवारण, श्रीवासका विष्णुसहस्र-नाम पाठ, महाप्रभुकी नृसिंहावेश-लीला, श्रीगौरनामसे अपराध क्षय, श्रीगौरदर्शनसे संसार ध्वंस, महाप्रभुका महेशावेश, भिक्षुको श्रीकृष्णप्रेम प्रदान, ज्योतिषीके द्वारा महाप्रभुको 'साक्षात् भगवान्' बतलाना, ज्योतिषीके द्वारा श्रीगौर-निताइ-तत्त्व कहना, महाप्रभुकी बलदेवके आवेशमें यमुना आकर्षण-लीला और बारह घण्टे तक नृत्य, महाप्रभुकी आज्ञासे प्रति गृहमें श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, काजीके द्वारा मृदङ्ग तोड़ना, कीर्तन-विरोध और निषेध, महाप्रभुके द्वारा सभीको नगर सङ्कीर्तन करनेका आदेश और काजी दलन, काजीके साथ शास्त्र-विचार, काजीके द्वारा स्वप्नमें देखी गयी नृसिंह-मूर्तिके दर्शनका उपाख्यान, काजीके पयादोंके मुख और दाढ़ी जलनेका विवरण, काजीके निकट स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग, काजीका वंशधरोंके प्रति 'तालाक', श्रीवासके पुत्रका परलोकगमन, महाप्रभुके द्वारा नारायणीको उच्छिष्ट दान, यवन दर्जीके द्वारा महाप्रभुकी कृपा प्राप्ति, श्रीवासके द्वारा वृन्दावन लीलाका वर्णन, आचार्य रत्नके घरमें महाप्रभुका लक्ष्मीके आवेशमें नृत्य, किसी ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरण स्पर्श करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें छलांग लगाना, महाप्रभुका उच्च स्वरमें 'गोपी' 'गोपी' कहना और पाषण्डी छात्रके द्वारा मना किये जानेपर महाप्रभुका क्रोध, पाखण्डियोंकी दुर्गति देखकर महाप्रभुकी करुणा और संन्यास ग्रहण, केशव भारतीका नदिया आगमन और महाप्रभुके साथ मिलन, महाप्रभुका काटोया जाकर संन्यास ग्रहण करना, चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन, महाप्रभुका राधाभाव, श्रीगौरनागरवादका खण्डन, श्रीकृष्णके अन्य रूपोंमें गोपियोंकी अप्रीति, गोपियोंकी श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीराधाके निकट श्रीकृष्णके चातुर्यकी पराजय, श्रीगौरलीलाके पार्षद एवं भक्तगणोंका तत्त्व, श्रीकृष्ण एवं श्रीगौरलीलाके रहस्य दुर्लभ, अचिन्त्य एवं तर्कातीत, तार्किकोंकी दुर्गति, श्रद्धावानकी ही सेवा प्रवृत्ति तथा आदिलीलाकी पुनरावृत्ति। vi