भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 563

नवाँ अध्याय नवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें भक्तिको एक वृक्षके रूपमें वर्णन करके एक रहस्यको प्रकट किया गया है कि मूलवृक्ष विश्वम्भर-श्रीगौराङ्ग महाप्रभु ही भक्तिवृक्षके माली और उसके फलके दाता एवं भोक्ताके रूपमें भी हैं। श्रीनवद्वीपधाममें यह फलवृक्ष रोपित हुआ और उसके पश्चात् पुरुषोत्तम, वृन्दावनआदि अन्य स्थानोंमें ऐसे प्रेमफलके उद्यानोंकी वृद्धि हुई। श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस वृक्षके प्रथम अङ्कुर हैं और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरीने इस अङ्कुरको पुष्ट किया। महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव माली होकर अपनी अचिन्त्य-शक्तिके बलसे इस वृक्षके स्कन्ध भी हैं। श्रीपरमानन्दपुरी आदि नौ संन्यासी इस वृक्षके मूल हैं। मूल-स्कन्धके ऊपर श्रीअद्वैताचार्य एवं श्रीनित्यानन्दरूप और भी दो स्कन्ध हुए। इन दो स्कन्धोंसे अनेक प्रकारकी शाखाएँ-उपशाखाएँ निकलीं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌को आवृत्त कर लिया। इस वृक्षके प्रेमफलको सर्वत्र सभीको ही दान किया है। इस प्रकार भक्तिवृक्षको रोपण करके उसके फलास्वादनके द्वारा जगत्‌को आनन्दमें डुबो दिया। यह वर्णन एक रूपक है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कृपासे असम्भव भी सम्भव :— तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं वन्दे जगद्गुरुम्। यस्यानुकम्पया श्वापि महाब्धिं सन्तरेत् सुखम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा प्राप्त करके एक कुकुर (कुत्ता) भी महासागरको पार करनेमें समर्थ हो जाता है, उन जगद्गुरु श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) अनुकम्पया (प्रसादेन) श्वा (कुकुरः) अपि महाब्धिं (महासमुद्रं) सुखं सन्तरेत् (सन्तरणेन तत्पारं गच्छेत्), तं जगद्गुरुं (सर्वजगतां गुरुं पूज्यं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जयाद्वैत जय जय नित्यानन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण। सर्वाभीष्ट-पूर्ति हेतु याँहार स्मरण ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो, जय हो, जिनके स्मरणसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ 3 ॥ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ ॥ 4 ॥ एसब-प्रसादे लिखि चैतन्य-लीलागुण। जानि वा ना जानि, करि आपन-शोधन ॥ 5 ॥ अनुवाद—श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी—इन सबकी कृपासे मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं इन्हें जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ, तो भी अपने चित्तकी शुद्धिके लिये मैं इन्हें लिख रहा हूँ॥ 4-5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आपन शोधन'—अपने शुद्धिकरणके लिये ॥ 5 ॥ महाप्रभु स्वयं 'माली' :— मालाकारः स्वयं कृष्ण-प्रेमामृतरुः स्वयम्। दाता भोक्ता तत्फलानां यस्तं चैतन्यमाश्रये ॥ 6 ॥

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