भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 568

[ 9/14 पुरी गोसाईंकी प्रीतिके कारण ही मैं पृथ्वीपर आया हूँ, यह निश्चय ही जानना।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (118 श्लोक) में इस प्रकार वर्णन आता है— “पुरी श्रीपरमानन्दो य आसीदुद्धवः पुरा।” “पहले जो उद्धव थे, वे ही अब श्रीगौरलीलामें श्रीपरमानन्द पुरी हैं।” केशवभारती—श्रीशङ्कर-प्रवर्त्तित दशनामी दण्डिगर्णोंके अन्यतम 'भारती' सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त हैं। सरस्वती, पुरी और भारती—ये तीन सम्प्रदाय दक्षिणापथके शृंगेरी मठके अधीन हैं। श्रीकेशवभारती उस समय काटोयाके शाखा मठमें अधिष्ठित थे। किसी-किसीका यह कहना है कि ये ब्रह्म संन्यासी होनेपर भी श्रीमाध्व-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके मन्त्र-शिष्य और वैष्णव संन्यासी थे। वर्द्धमान जिलाके कान्द्रा डाकघरके अन्तर्गत खाटुन्दि गाँवमें इनकी देवसेवा और मठ स्थापित हैं। मठाधिकारियोंके मतानुसार वे सब श्रीकेशवभारतीके वंशज हैं। श्रीकेशवके पुत्र (अन्य मतानुसार शिष्य)—निशापति और ऊषापति हैं। [श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके द्वारा यह टीका लिखे जानेके समय] निशापतिके वंशमें श्रीनकड़िचन्द्र विद्यारत्न सेवाधिकारीके रूपमें वर्त्तमान थे और ऊषापतिके वंशज हुगलीके वैँचिके निकट राखालदासपुरमें विद्यमान थे। किसी अन्यके मतानुसार ये (निशापति और ऊषापति) श्रीकेशव भारतीके पूर्वाश्रमके वंशज भी हो सकते हैं। किसी अन्यके मतानुसार, श्रीकेशवभारतीके भ्राता, मतान्तरसे उनके शिष्य माधव भारतीके शिष्य बलभद्र भी भारती थे। बलभद्रके पूर्वाश्रमके दो पुत्र मदन और गोपाल थे, मदन आउरियामें और गोपाल देन्दुड़में वास करते थे। मदनके वंशमें 'भारती' और गोपालके वंशमें 'ब्रह्मचारी' उपाधि हैं। इन दोनों वंशोंके अनेक उत्तराधिकारी विद्यमान हैं। श्रीगौरगणोद्देश दीपिकाके 52 श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “मथुरायां यज्ञसूत्रं पुरा कृष्णाय यो मुनिः। ददौ सान्दीपनिः सोऽभूत् अद्य केशवभारती॥” “पूर्वकालमें मथुरामें श्रीकृष्णका यज्ञोपवीत संस्कार करानेवाले श्रीसान्दीपनि मुनि अब श्रीगौरलीलामें श्रीकेशव भारती हैं।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाका 117 श्लोक— “इति केचित् प्रभाषन्तेऽक्रूरः केशवभारती॥” “कोई-कोई श्रीकेशव भारतीको अक्रूरका अवतार भी कहते हैं।” 1432 शकाब्दमें कटोयामें इन्होंने निमाइ पण्डितको संन्यास प्रदान किया। वैष्णवमञ्जुषा-द्वितीय संख्या द्रष्टव्य है। श्रीब्रह्मानन्दपुरी—श्रीमहाप्रभुकी नवद्वीपलीलामें ये कीर्त्तनके सङ्गी थे। संन्यास ग्रहण करनेसे पहले भी और संन्यासके बाद भी महाप्रभु उनपर विशेष विश्वास करते थे। नीलाचलमें भी ये महाप्रभुके सङ्गी होकर आये थे। श्रीब्रह्मानन्द भारती—जब वे नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शनके लिये गये, तब उनका नीचेका वस्त्र मृगके चमड़ेसे निर्मित था। यद्यपि वे महाप्रभुके निकट थे, तो भी महाप्रभु छल करते हुए कहने लगे कि मैं ब्रह्मानन्द भारतीको देखना चाहता हूँ। यह सुनकर अर्थात् महाप्रभुके अभिप्रायको जानकर श्रीब्रह्मानन्दने चमड़ेके वस्त्र परित्यागकर काषाय-बहिर्वासको ग्रहण किया। इन्होंने महाप्रभुके निकट फिर कुछ दिनों तक नीलाचलमें वास किया॥13॥ केशवपुरी, कृष्णानन्दपुरी, नृसिंहतीर्थ और सुखानन्दपुरीके सम्बन्धमें श्रीगौरगणोद्देश दीपिकामें (97-101 श्लोक) इस प्रकार वर्णन आता है— “अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः। कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ। पुर्युपाधिक्रमात् ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः ॥97॥ जायन्तेयाः स्थिता ऊर्ध्वरेतसः समदर्शिनः। नव भागवताः पूर्वं श्रीभागवतसंहिताः॥98॥ प्रत्यूचुर्जनकं तेऽद्य भूत्वा संन्यासिनः सदा। प्रभुणा गौरहरिणा विहरन्ति स्म ते यथा॥99॥ 32 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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