भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 9/22-36 करना सम्भव नहीं है। जिस प्रकार गूलर वृक्षके सभी अङ्गोंमें फल लगता है, उसी प्रकार भक्ति-वृक्षके प्रत्येक अङ्गमें फल लग गये ॥ 22-25 ॥ उससे माली श्रीगौरकी श्रीकृष्ण-प्रेमामृत फल-वितरण-लीला :- मूलस्कन्धेर शाखा आर उपशाखागणे। लागिल ये प्रेमफल,-अमृतके जिने ॥ 26 ॥ अनुवाद-(चैतन्य महाप्रभुरूपी) मूल तनेकी शाखाओं- उपशाखाओंमें जो फल लगे, वे अमृतको भी पराभूत करनेवाले थे॥ 26 ॥ बिना मूल्य प्रेमफल-वितरण :- पाकिल ये प्रेमफल अमृत-मधुर। बिलाय चैतन्यमाली, नाहि लय मूल ॥ 27 ॥ त्रिजगते यत आछे धन-रत्नमणि। एकफलेर मूल्य करि' ताहा नाहि गणि ॥ 28 ॥ अनुवाद-जो प्रेमफल पक गये, उनका स्वाद अमृतसे भी मधुर था। माली श्रीचैतन्य महाप्रभु उन मधुर फलोंको बिना मोलके ही बाँटने लगे। तीनों लोकोंमें जितनी भी धन-रत्न-मणि आदि सम्पत्ति है, उसका मूल्य इस वृक्षके एक प्रेमफलके समान भी नहीं है ॥ 27-28 ॥ अनुभाष्य-'मूल'-मूल्य ॥ 27 ॥ पात्र-अपात्र विचार बिना वितरण :- मागे वा ना मागे केह, पात्र वा अपात्र। इहार विचार नाहि जाने, देय मात्र ॥ 29 ॥ अनुवाद-किसीने माँगा अथवा नहीं माँगा, कोई इसका अधिकारी था या नहीं था, इसपर बिना कोई विचार किये श्रीचैतन्य महाप्रभु सबको यह प्रेमफल देते गये ॥ 29 ॥ दीन-दुःखी जीवोंका उद्धार :- अञ्जलि अञ्जलि भरि' फेले चतुर्दिशे। दरिद्र कुड़ाञा खाय, मालाकार हासे ॥ 30 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अञ्जली भर-भरकर प्रेमफलको चारों ओर फेंकने लगे। दरिद्र (साधन-भजन अथवा प्रेम रूपी धनसे विहीन) लोग उन्हें उठा-उठाकर खाने लगे, तो श्रीचैतन्यमाली उनको देखकर हँसने लगे ॥ 30 ॥ मालाकार कहे,-शुन, वृक्ष-परिवार। मूलशाखा-उपशाखा यतेक प्रकार ॥ 31 ॥ चैतन्य-वृक्षके सभी अङ्ग ही चेतनमय और चेतनमय फलास्वादनसे अचेतन जीवोंका चैतन्य होना :- अलौकिक वृक्ष करे सर्वेन्द्रिय-कर्म। स्थावर हइया धरे जङ्गमेर धर्म ॥ 32 ॥ ए वृक्षेरे अङ्ग हय सब सचेतन। बाड़िया व्यापिल सबे सकल भुवन ॥ 33 ॥ अनुवाद-माली कहने लगे-"वृक्षके परिवारकी मूलशाखाओं! उपशाखाओं! सब सुनो। यह भक्तिवृक्ष अलौकिक है, यह सभी इन्द्रियोंसे दूसरी इन्द्रियोंके कार्य करनेमें सक्षम है और स्थावर होते हुए भी इसने जङ्गमके धर्मको अपनाया हुआ है। इस वृक्षके समस्त अङ्ग चेतन हैं, जो फैलकर समस्त जगत्में व्याप्त हो गये हैं ॥ 31-33 ॥ नामप्रचार अकेले असम्भव देखकर सबको बिना विचार किये वितरणका आदेश :- एकला मालाकार आमि काहाँ काहाँ याब। एकला वा कत फल पाड़िया विलाब ॥ 34 ॥ एकला उठाञा दिते हय परिश्रम। केह पाय, केह ना पाय, रहे मने भ्रम ॥ 35 ॥ अतएव आमि आज्ञा दिलुँ सबाकारे। याँहा ताँहा प्रेमफल देह' यारे तारे ॥ 36 ॥ 34 | श्रीचैतन्यचरितामृत