भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 573

9/45-52 ] वृक्षोंकी निर्हेतुक दया-दर्शनसे, मूल कल्पवृक्ष होनेकी इच्छा :- माली हञा वृक्ष हइलाङ एइ त' इच्छाते। सर्वप्राणीर उपकार हय वृक्ष हैते॥ 45 ॥ अनुवाद-वृक्षसे समस्त प्राणियोंका उपकार होता है, इसी इच्छासे मैं माली होते हुये भी वृक्ष बना हुआ हूँ॥ 46 ॥ श्रीमद्भागवत (10/22/33)- अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीविनाम्। सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 46 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे वृक्षों को लक्ष्य करके कह रहे हैं, - "अहो ! ये [वृक्ष] सब प्राणियोंके उपजीविका स्वरूप हैं अर्थात् समस्त प्राणियोंका उपकार करते हैं, इसलिये इनका जन्म सफल है। इनके निकट आकर कोई भी याचक विमुख होकर नहीं लौटता। ये सब सुजनगणकी भाँति व्यवहार करते हैं॥" 46॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-वस्त्रहरण-लीलाके अन्तमें अपने सखा गोपबालकोंके साथ बहुत दूर जाकर वृक्षके नीचे बैठकर विश्राम करते हुए वृक्षोंकी सहिष्णुता और सदा परोपकार-प्रवृत्ति देखकर उनको लक्ष्य करके श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे कहने लगे- अहो एषां (वृक्षाणां) सर्वप्राण्युपजीवनं (सर्वेषां प्राणिनाम् उपजीवनं) जन्म सुजनस्य इव वरं (श्रेष्ठं), - येषां (येभ्यः) अर्थिनः (प्रार्थिनः) विमुखाः (विफलाभीष्टाः सन्तः) न यान्ति (प्रत्यावर्त्तन्ते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ इति अनुभाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त हुआ। यह सुनकर वृक्षके अङ्गोंको आनन्द :- एइ आज्ञा कैल यदि चैतन्य-मालाकार। परम आनन्द पाइल वृक्ष-परिवार ॥ 47 ॥ अनुवाद-जब श्रीचैतन्य मालीने यह आज्ञा प्रदान की, तो वृक्ष-परिवार अर्थात् महाप्रभुके पार्षद परमानन्दित हुए॥ 47 ॥ अधिकारके विचार बिना प्रेमफल-वितरण :- येइ याँहा ताँहा दान करे प्रेमफल। फलास्वादे मत्त लोक हइल सकल ॥ 48 ॥ महामादक प्रेमफल पेट भरि' खाय। मातिल सकल लोक-हासे, नाचे, गाय ॥ 49 ॥ केह गड़ागड़ि याय, केह त' हुँकार। देखि' आनन्दित हञा हासे मालाकार ॥ 50 ॥ अनुवाद-फिर वे जहाँ-तहाँ प्रेमफल प्रदान करने लगे, जिसका आस्वादनकर सभी लोग प्रेमोन्मत्त हो उठे। महामत्त करनेवाले उस प्रेमफलको पेट भर खाकर सभी लोग मत्तवालोंकी भाँति हँसने, नाचने, गाने लगे। कोई भूमिपर लोट-पोट होने लगे, तो कोई हुँकार करने लगे। यह सब देखकर श्रीचैतन्य माली आनन्दित होकर हँसने लगे ॥ 48-50 ॥ जीवोंको अपने समान श्रीकृष्णप्रेमार्पणके द्वारा महाभागवत बनाना :- एइ मालाकार खाय एइ प्रेमफल। निरवधि मत्त रहे, विवश-विह्वल ॥ 51 ॥ सर्वलोके मत्त कैला आपन-समान। प्रेमे मत्त लोक बिना नाहि देखि आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य माली स्वयं भी इस प्रेमफलका आस्वादनकर निरन्तर उन्मत्त रहते और वे प्रेमके द्वारा विवश तथा विह्वल हो जाते। उन्होंने सभी लोगोंको अपने समान इतना प्रेमोन्मत्त कर दिया कि कोई भी ऐसा नहीं दीखता था, जो प्रेममें मत्त न हो ॥ 51-52 ॥ नवाँ अध्याय | 37