भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 683

तेरहवाँ अध्याय तेरहवें अध्यायका कथासार—इस तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुकी जन्मलीलाका वर्णन हुआ है। उनकी गृहस्थलीलाको आदिलीला और उनकी संन्यासलीलाको अन्त्यलीला कहा गया है। उनकी (अन्त्यलीला) के प्रथम छह वर्षकी लीलाका नाम 'मध्यलीला' है, जिसमें महाप्रभुने दक्षिणदेश, वृन्दावनदि तीर्थोंमें गमनागमन और नामका प्रचार किया। श्रीहट्टनिवासी उपेन्द्रमिश्रके पुत्र जगन्नाथ मिश्र हैं। वे नवद्वीपमें वास करने लगे और उन्होंने नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी पुत्री शचीदेवीसे विवाह किया। उनकी पहले आठ कन्याएँ हुईं। वे कन्याएँ जन्म लेनेके बाद ही परलोक सिधार गयीं और नवें गर्भसे विश्वरूपका जन्म हुआ। 1407 शकमें फाल्गुनी-पूर्णिमामें सन्ध्याकालमें सिंह-लग्न, सिंह-राशिमें चन्द्र-ग्रहणके समय श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके साथ श्रीगौरचन्द्र अवतीर्ण हुए। शिशुका जन्म सुनकर सम्भ्रान्त महिलायें अनेक उपहारोंके साथ शिशुके दर्शनके लिये आयीं। नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने उनकी जन्मपत्री और हस्तरेखायें देखकर उनमें महापुरुषोंके चिह्न देखे। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे अधम व्यक्तिकी भी उनकी लीलावर्णनमें योग्यता :- स प्रसीदतु चैतन्यदेवो यस्य प्रसादतः। तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः स्यादधमोऽप्ययम् ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रसन्न होनेपर मेरे जैसा अधम व्यक्ति भी उनकी लीला-वर्णनमें तुरन्त योग्यता लाभ करता है, वे श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥ अनुभाष्य—यस्य (श्रीकृष्णचैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया) अयं (मादृशः) अधमः अपि तल्लीलावर्णने सद्यः योग्यः स्यात्, स चैतन्यदेवः प्रसीदतु। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जयाद्वैतचन्द्र जय जय नित्यानन्द ॥२॥ जय जय गदाधर जय श्रीनिवास। जय मुकुन्द वासुदेव जय हरिदास ॥३॥ जय दामोदर-स्वरूप जय मुरारि गुप्त। एइ सब चन्द्रोदये तमः कैल लुप्त ॥४॥ भक्त-चन्द्रकी हरिभजन-किरणोंसे जीवोंका अज्ञान-तमो-विनाश :- जय श्रीचैतन्येर भक्त पूर्णचन्द्रगण। सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय उज्ज्वल त्रिभुवन ॥५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्र और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीगदाधर पण्डितकी जय हो, जय हो, श्रीनिवास पण्डितकी जय हो। श्रीमुकुन्द और श्रीवासुदेवकी जय हो, श्रीहरिदास ठाकुरकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदरकी जय हो, श्रीमुरारि गुप्तकी जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभुके पूर्णचन्द्ररूपी भक्तोंकी जय हो। इन सब चन्द्रमाओंने उदित होकर (अज्ञानरूप) अन्धकारको दूर किया है। इन सबके प्रेमकी ज्योत्स्नासे तीनों लोक प्रकाशित हो गये हैं॥२-५॥ श्रीगौरलीलाका वर्णन आरम्भ :- एइ त' कहिल ग्रन्थानारम्भे मुखबन्ध। एबे कहि चैतन्य-लीलाक्रम-अनुबन्ध ॥६॥ पहले सूत्ररूपमें और बादमें सविस्तार वर्णन-प्रतिज्ञा :- प्रथमे त' सूत्ररूपे करिये गणन। पाछे विस्तार करिब तार विवरण ॥७॥ अनुवाद—अभी तक मैंने ग्रन्थकी भूमिका कही है।