श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रवृत्ति और निवृत्ति भेदसे दो मार्ग दिखलाये हैं। निवृत्ति-मार्गमें जीवमात्रका वध निषेध है। प्रवृत्ति-मार्गमें गोवधकी विधिका विधान है, इसलिये हमें शास्त्रकी आज्ञानुसार वध करनेसे पापका भय नहीं है। आपके वेदोंमें भी तो गोवधके विषयमें कहा गया है, इसलिये बड़े-बड़े मुनि भी तो गोवध करते हैं॥" 155-158॥ अनुभाष्य-'केताब'-ग्रन्थ। 'सरियत्', 'तरिकत्' और 'मारफत्'—ये तीन प्रकारके पथ हैं॥ 155-158॥ अमृतानुकणिका-श्रीमद्भागवतम् ग्यारहवें स्कन्ध (11/5/11, 13-15) में आठवें योगेन्द्र चमसेने राजा निमिसे कहा— “लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्या हि जन्तोर्न हि तत्र चोदना। व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ- सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा॥ 11॥ यद्घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा। एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ 13॥ ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः। पशून् द्रुह्यन्ति विश्रब्धाः प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ 14॥ द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्। मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः॥" 15॥ “कर्म मीमांसक वेदोंके अर्थवादमें निरत होकर ऐसा सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि स्त्रीसङ्ग, आमिष (मांस) भोजन एवं मदिरापान करनेके लिये वेदोंकी प्रेरणा है, अर्थात् इन सभी क्रियाओंको करनेकी प्रेरणा देनेके लिये ही वेदोंमें इस प्रकारके यज्ञोंकी व्यवस्था दी गयी है। किन्तु वे यह नहीं जानते कि ये सभी प्रवृत्तियाँ जीव-जन्तुमात्रके (वास्तविक आत्माके स्वभावमें नहीं, बल्कि देहके) निसर्गगत स्वभावमें ही हैं, इसलिये वे प्रेरणाकी अपेक्षा नहीं रखतीं। इन सभी प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिके लिये ही विवाहके द्वारा स्त्रीसङ्ग, यज्ञके माध्यमसे आमिष भोजन और (सौत्रामणि यज्ञमें ही) सुरा-ग्रहणकी व्यवस्था वेदोंमें दी गयी है। इसलिये निवृत्ति ही वेदोंका गूढ़ तात्पर्य है। किसी विशेष परिस्थितिमें मद्यके सूँघनेमात्रको ही भक्षणके रूपमें कहा गया है और (वृद्ध) पशुओंका वध करके उसे पुनर्जीवितकर युवा शरीर देनेके उद्देश्यसे ही विधान है, पशु वधका नहीं। इसी प्रकार स्त्रीसङ्ग भी केवल सन्तानोत्पत्तिके लिये विहित है, रतिक्रीड़ाके लिये नहीं। यह विशुद्ध वेदमत ही स्वधर्म है, परन्तु वेदार्थवादीगण इस निगूढ़ सिद्धान्तको जानते ही नहीं हैं। जो व्यक्ति वेदोंके इस तात्पर्यको नहीं जानते, वे वास्तवमें धर्मके तत्त्वको नहीं जाननेवाले, अविनीत और साधु होनेका अभिमान करनेवाले हैं। ये लोग निर्भीक होकर पशुओंका वध करते हैं और इन लोगोंके मरनेके बाद वे पशु ही इन्हें खाते हैं। देखो ! आत्मास्वरूप ईश्वर श्रीहरि (हमारे एवं अन्यान्य) सभी प्राणियोंके शरीरमें अवस्थान कर रहे हैं, किन्तु मूर्ख लोग (अन्योंके शरीरमें स्थित हरिके प्रति विद्वेष करके) अपने शवतुल्य अनित्य शरीरके पोषणके अभिप्रायसे पशुओंका वध करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे देहमें आसक्त होकर अधःपतित हो जाते हैं॥” 155-158॥ पुनर्जीवन प्राप्तिके कारण वेद-विहित वध-समर्थन :- प्रभु कहे,—“वेदे कहे गोवध निषेध। अतएव हिन्दुमात्र ना करे गोवध॥ 159॥ जियाइते पारे यदि, तबे मारे प्राणी। वेद-पुराणे आछे हेन आज्ञा-वाणी॥ 160॥ अतएव जरद्गव मारे मुनिगण। वेदमन्त्रे सिद्ध करे ताहार जीवन॥ 161॥ जरद्गव हञा युवा हय आरबार। ताते तार वध नहे, हय उपकार॥ 162॥ कलिकालमें ब्राह्मण निःशक्तिक :- कलिकाल तैछे शक्ति नाहिक ब्राह्मणे। अतएव गोवध केह ना करे एखने॥ 163॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “वेदोंमें गोवध निषेध