भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 787

17/204-212 ] आसि' कहे, - 'हिन्दुर धर्म भाङ्गिला निमाञि। ये कीर्त्तन प्रवर्त्ताइल, कभु शुनि नाइ॥ 204 ॥ मङ्गलचण्डी, विषहरि करि जागरण। तांते नृत्य, गीत, वाद्य - योग्य आचरण॥ 205 ॥ पूर्वे भाल छिल एइ निमाइ पण्डित। गया हैते आसिया चालाय विपरीत॥ 206 ॥ उच्च करि' गाय गीत, देय करतालि। मृदङ्ग-करताल-शब्दे कर्णे लागे तालि॥ 207 ॥ न जानि, -कि खाञा मत्त हञा नाचे, गाय। हासे, कान्दे, पड़े, उठे, गड़ागड़ि याय॥ 208 ॥ नगरिया पागल कैल सदा सङ्कीर्त्तन। रात्रे निद्रा नाहि याइ, करि जागरण॥ 209 ॥ अनुवाद - उन्होंने आकर कहा, - 'निमाइने हिन्दुओंके धर्मको नष्ट कर दिया है। उसने जिस प्रकारका कीर्त्तन प्रारम्भ किया है, उसे तो हमने पहले कभी सुना नहीं है। हम जो मङ्गलचण्डी, शङ्करादिका जागरण करते हैं, उसमें तो वाद्यादिके साथ नृत्य-गीत हिन्दुओंके लिये उचित है। निमाइ पण्डित पहले तो बहुत अच्छा था, परन्तु गयासे आनेके बाद यह विपरीत चाल चलने लगा है। निमाइ और उसके सङ्गी हाथोंसे ताली बजाते हुए ऊँचे स्वरमें गीत गाते हैं और साथमें मृदङ्ग-करतालादि भी बजते हैं। उनके शोरसे तो कानमें कुछ और सुनायी ही नहीं देता। न जाने क्या खाकर (क्या किसी मादक द्रव्यका पानकर) मत्त होकर नाचते, गाते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, गिरते हैं, उठते हैं और भूमिपर लोट-पोट होते हैं। निमाइके सङ्कीर्त्तनने तो सारे नगरवासियोंको पागल बना दिया है। उनके सङ्कीर्त्तनसे हमें रातमें नींद नहीं आती, हम तो जागरण करते हैं॥ 204-209 ॥ 'निमाञि' नाम छाड़ि' एबे बोलाय 'गौरहरि'। हिन्दुर धर्म नष्ट कैल पाषण्डी सञ्चारि' ॥ 210 ॥ कृष्णेर कीर्त्तन करे नीच बाड़ बाड़। एइ पापे नवद्वीप हइबे उजाड़॥ 211 ॥ अनुवाद - अब वह अपना 'निमाइ' नाम छोड़कर अपनेको 'गौरहरि' कहता है और पाषण्डताका प्रचारकर हिन्दू धर्मको नष्ट कर रहा है। अब तो इसके साथ श्रीकृष्णनामके कीर्त्तनमें (जिनका कीर्त्तनमें अधिकार नहीं है, ऐसे) नीच जातिके लोग बढ़ रहे हैं, इस पापसे तो नवद्वीप उजड़ जायेगा॥ 210-211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'नीच बाड़बाड़'-अनेक नीच जातिके लोगोंको लेकर श्रीकृष्णकीर्त्तन कर रहा है, इससे नीच जातिकी बाढ़ अर्थात् वृद्धि हो रही है॥ 211 ॥ हिन्दुशास्त्रे 'ईश्वर' नाम - महामन्त्र जानि। सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर वीर्य हय हानि॥ 212 ॥ अनुवाद - हिन्दू शास्त्रोंमें ईश्वरके नामको महामन्त्र बतलाया गया है, [उच्च स्वरसे कीर्त्तन करनेपर] सभी लोगोंके द्वारा मन्त्र सुननेपर मन्त्रकी शक्ति लुप्त हो जाती है॥ 212 ॥ अनुभाष्य - अनेक ईश्वरोंको माननेवाले ईश्वरको और ईश्वरके नामको 'कर्मका अङ्ग' समझते हैं, इसलिये वे 'पाषण्डी' कहलाते हैं। श्रीकृष्णनामकी महान् औदार्यमयी महिमाको न जाननेके कारण सांसारिक उच्च-कुलमें जन्म और सामाजिक पदवीके मोहमें भूलकर वे सोचते हैं कि नीच अर्थात् नीच-कुलमें उत्पन्न व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करना विशेष पापका कार्य है। इसलिये सत्कुल अथवा उच्चकुलमें जन्में व्यक्तिका ही श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेमें अधिकार है। ये सब बहु-ईश्वरवादी सदा कीर्त्तनीय श्रीकृष्णनाम-महामन्त्रको अन्यान्य जप्यमन्त्रोंके समान मानते हैं। जो अपने अद्वितीय परमैश्वर्यको प्रकाशित करके ब्रह्मासे लेकर चींटीतकका उद्धार करनेकी शक्ति रखता है, ऐसे महामन्त्रका उच्च-स्वरसे कीर्त्तन करनेपर सतरहवाँ अध्याय | 251

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