श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय २७ ] | लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत लिङ्गपूजाका विधान | १२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न्यग्रोधबीजे न्यग्रोधस्तथा सूत्रे तु शोभने।<br>महत्यपि महद् ब्रह्म संस्थितं सूक्ष्मवत्स्वयम्॥ ७ | जिस प्रकार वटके बीजमें विशाल वटवृक्षका भाव उपस्थित रहता है, उसी प्रकार इस पवित्र एवं महतयुक्त सूत्रमें महान् ब्रह्म सूक्ष्मरूपसे साक्षात् विराजमान है॥ ६-७॥ |
| सेचयेदर्चनस्थानं गन्धचन्दनवारिणा।<br>द्रव्याणि शोधयेत्पश्चात्क्षालनप्रोक्षणादिभिः॥ ८<br>क्षालनं प्रोक्षणं चैव प्रणवेन विधीयते।<br>प्रोक्षणीं चार्र्घ्यपात्रं च पाद्यपात्रमनुक्रमात्॥ ९ | पूजाके स्थानको गन्ध तथा चन्दनसे युक्त जलके द्वारा सेचित करना चाहिये; पुनः सभी पूजनद्रव्योंको क्षालन, प्रोक्षण आदिसे शोधित कर लेना चाहिये। क्षालन तथा प्रोक्षण प्रणवसे ही किया जाता है॥ ८ १/२॥ |
| तथा ह्याचमनीयार्थं कल्पितं पात्रमेव च।<br>स्थापयेद्विधिना धीमानवगुण्ठ्य यथाविधि॥ १०<br>दर्भैराच्छादयेच्चैव प्रोक्षयेच्छुद्धवारिणा।<br>तेषु तेष्वथ सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम्॥ ११ | विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र तथा आचमनपात्रको भलीभाँति अनुक्रमसे स्थापित करे और फिर विधिपूर्वक अवगुंठन करे। पुनः उन सभी पात्रोंमें शुद्ध एवं शीतल जल डालकर उन्हें कुशोंसे ढककर उनपर शुद्ध जलका प्रोक्षण करना चाहिये॥ ९-११॥ |
| प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्धिमान्।<br>उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत्॥ १२<br>जातिकङ्कोलकर्पूरबहुमूलतमालकम् ।<br>चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके॥ १३<br>एवं सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्चन्दनं तथा।<br>कर्पूरं च यथान्यायं पुष्पाणि विविधानि च॥ १४ | तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुषको उन पात्रोंमें भलीभाँति देखकर विभिन्न द्रव्य प्रणवपूर्वक डालने चाहिये। पाद्यपात्रमें उशीर तथा चन्दन डाले और जाति, कंकोल, कपूर, शतावरी एवं तमालका चूर्ण बनाकर इन्हें उचित मात्रामें आचमनीय पात्रमें डाले। चंदन, कपूर तथा विविध प्रकारके पुष्प सभी पात्रोंमें डालने चाहिये॥ १२-१४॥ |
| कुशाग्रमक्षतांश्चैव यवव्रीहितिलानि च।<br>आज्यसिद्धार्थपुष्पाणि भसितं चार्र्घ्यपात्रके॥ १५<br>कुशपुष्पयवव्रीहिबहुमूलतमालकम् ।<br>दापयेत्प्रोक्षणीपात्रे भसितं प्रणवेन च॥ १६ | कुशका अग्रभाग, अक्षत, यव, धान, तिल, घी, सफेद सरसों, पुष्प तथा भस्म—इन्हें अर्घ्यपात्रमें डालना चाहिये। कुश, पुष्प, यव, धान, शतावरी, तमाल एवं भस्म—इन द्रव्योंको प्रणवसे प्रोक्षणीपात्रमें डालना चाहिये॥ १५-१६॥ |
| न्यसेत्पञ्चाक्षरं चैव गायत्रीं रुद्रदेवताम्।<br>केवलं प्रणवं वापि वेदसारमनुत्तमम्॥ १७ | तत्पश्चात् पञ्चाक्षर मन्त्र, रुद्रगायत्री अथवा केवल वेदसाररूप सर्वोत्तम प्रणवसे इन पात्रोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये॥ १७॥ |
| अथ सम्प्रोक्षयेत्पश्चाद् द्रव्याणि प्रणवेन तु।<br>प्रोक्षणीपात्रसंस्थेन ईशानाद्यैश्च पञ्चभिः॥ १८ | इसके अनन्तर प्रणवयुक्त ईशान ( ॐ ईशानः सर्वविद्यानाम्० ) आदि पाँच याजुष मन्त्रोंसे प्रोक्षणीपात्रमें स्थित जलके द्वारा सभी पूजनद्रव्योंका प्रोक्षण करे॥ १८॥ |
| पार्श्वतो देवदेवस्य नन्दिनं मां समर्च्चयेत्।<br>दीप्तानलायुतप्रख्यं त्रिनेत्रं त्रिदशेश्वरम्॥ १९<br>बालेन्दुमुकुटं चैव हरिवक्त्रं चतुर्भुजम्।<br>पुष्पमालाधरं सौम्यं सर्वाभरणभूषितम्॥ २० | पुनः देवदेव शिवजीके दाहिनी ओर स्थित हजारों देदीप्यमान अग्निके सदृश वर्णवाले, बालचन्द्रमाको मुकुटरूपमें सिरपर धारण करनेवाले, वानरके तुल्य |