श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्रौञ्चो वामनकः पश्चात्तुतीयश्चान्धकारकः।<br>अन्धकारात्परश्चापि दिवावृन्नाम पर्वतः॥ १४<br><br>दिवावृतः परश्चापि विविन्दो गिरिरुच्यते।<br>विविन्दात्परतश्चापि पुण्डरीको महागिरिः॥ १५<br><br>पुण्डरीकात्परश्चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः।<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः॥ १६ | क्रौञ्चद्वीपमें भी क्रौञ्च आदि सात कुलपर्वत हैं। [पहला] क्रौञ्च, [दूसरा] वामन तथा तीसरा अन्धकारक पर्वत है। अन्धकारकके बाद दिवावृत् नामक पर्वत है। दिवावृत्के बाद विविन्द पर्वत कहा जाता है। विविन्दके बाद पुण्डरीक नामक महान् पर्वत है और पुण्डरीकके बाद दुन्दुभिस्वन पर्वत कहा जाता है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं॥ १३-१६॥ |
| शाकद्वीपे च गिरयः सप्त तांस्तु निबोधत।<br>उदयो रैवतश्चापि श्यामको मुनिसत्तमाः॥ १७<br><br>राजतश्च गिरिः श्रीमानाम्बिकेयः सुशोभनः।<br>आम्बिकेयात्परो रम्यः सर्वौषधिसमन्वितः॥ १८<br><br>तथैव केसरीत्युक्तो यतो वायुः प्रजायते। | शाकद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, उन्हें जानिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! उदय, रैवत, श्यामक, शोभासम्पन्न राजतपर्वत तथा अत्यन्त सुन्दर आम्बिकेय पर्वत हैं। आम्बिकेयके बाद सभी प्रकारकी औषधियोंसे युक्त रम्य नामक पर्वत है। उसके बाद केसरीपर्वत कहा गया है, जहाँसे वायु उत्पन्न होती है॥ १७-१८ १/२॥ |
| पुष्करे पर्वतः श्रीमान्नेक एव महाशिलः॥ १९<br><br>चित्रैर्मणिमयैः कूटैः शिलाजालैः समुच्छ्रितैः।<br>द्वीपस्य तस्य पूर्वार्धे चित्रसानुस्थितो महान्॥ २०<br><br>योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>अधश्चैव चतुस्त्रिंशत्सहस्त्राणि महाचलः॥ २१<br><br>द्वीपस्यार्धे परिक्षिप्तः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु नवचन्द्र इवोदितः॥ २२ | पुष्करद्वीपमें महाशिल नामक एक ही शोभासम्पन्न पर्वत है; यह अद्भुत मणियोंवाले शिखरोंसे तथा शिलासमूहोंसे युक्त है। यह महान् पर्वत उस द्वीपके आधे पूर्वी भागमें अनेक रंगोंके किनारोंके साथ पचास हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है। यह महान् पर्वत [भूतलसे] चौंतीस हजार योजन नीचेतक गया है। यह पर्वत द्वीपके आधे भागमें उत्तरकी ओर मानसशृंखलाके ऊपर फैला हुआ है। समुद्रके समीप स्थित यह पर्वत उगे हुए नवीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता है॥ १९-२२॥ |
| योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव तु विस्तीर्णः पार्श्वतः परिमण्डलः॥ २३<br><br>स एव द्वीपपश्चार्धे मानसः पृथिवीधरः।<br>एक एव महासानुः सन्निवेशाद् द्विधा कृतः॥ २४ | यह पचास हजार योजन ऊपरकी ओर उठा हुआ है। इसकी चौड़ाई तथा चारों ओरका घेरा भी उतना ही विस्तृत है। द्वीपके पश्चिमी आधे भागमें यही पर्वत मानस नामसे प्रतिष्ठित है। यह महापर्वत एक होता हुआ भी सन्निवेशके कारण दो भागोंमें विभक्त हो गया है॥ २३-२४॥ |
| तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>राजतौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ॥ २५<br><br>महावीतं तु यद्वर्षं बाह्यतो मानसस्य तु।<br>तस्यैवाभ्यन्तरो यस्तु धातकीखण्ड उच्यते॥ २६ | उस द्वीपमें चाँदीके समान प्रभाववाले दो पुण्यमय तथा शुभ जनपद बताये गये हैं, जो इस मानस पर्वतको घेरे हुए हैं। मानसके बाहर जो महावीत नामक वर्ष है, उसके भीतर जो जनपद है, उसे धातकीखण्ड कहा जाता है॥ २५-२६॥ |
| स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>पुष्करद्वीपविस्तारविस्तीर्णोऽसौ समन्ततः॥ २७<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पुष्करस्य समेन तु।<br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः॥ २८ | पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले सागरसे घिरा हुआ है। यह [सागर] सभी ओर पुष्करद्वीपके विस्तारके बराबर विस्तीर्ण है। यह विस्तारमें तथा घेरेमें पुष्कर द्वीपके ही समान है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए |