श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अदृश्यन्तीं महाभागां रक्ष वत्स महामते।<br>अरुन्धतीं च पितरं वसिष्ठं मम सर्वदा॥ १०१<br><br>अन्वयः सकलो वत्स मम सन्तारितस्त्वया।<br>पुत्रेण लोकान् जयतीत्युक्तं सद्भिः सदैव हि॥ १०२<br><br>ईप्सितं वरयेशानं जगतां प्रभवं प्रभुम्।<br>गमिष्याम्यभिवन्द्येशं भ्रातृभिः सह शङ्करम्॥ १०३ | पराशर! हे बाल! मैंने अणिमा आदि सिद्धियों तथा ऐश्वर्यको प्राप्त कर लिया, जो कि तुम्हारे मुखका आज मुझे दर्शन हुआ। हे वत्स! हे महामते! अब तुम मेरी आज्ञासे महाभाग्यशालिनी अदृश्यन्ती, [माता] अरुन्धती तथा मेरे पिता वसिष्ठकी सर्वदा रक्षा करते रहो। हे वत्स! तुमने मेरे समस्त कुलका उद्धार कर दिया; सज्जनोंने सदा यही कहा है कि [मनुष्य अपने] पुत्रके द्वारा [सभी] लोकोंको जीत लेता है। अब तुम जगत्को उत्पन्न करनेवाले प्रभु महेश्वरसे अभीष्ट वर माँगो और मैं अब भगवान् शंकरको प्रणाम करके भाइयोंके साथ जाऊँगा॥ ९९-१०३॥ |
| एवं पुत्रमुपामन्त्र्य प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>निरीक्ष्य भार्या सदसि जगाम पितरं वशी॥ १०४ | इस प्रकार पुत्रको परामर्श देकर महेश्वर तथा पिता वसिष्ठको प्रणाम करके सभामें [अपनी] भार्याकी ओर देखकर वे जितेन्द्रिय शक्ति चले गये॥ १०४॥ |
| गतं दृष्ट्वाथ पितरं तदाभ्यर्च्यैव शङ्करम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः शाक्तेयः शशिभूषणम्॥ १०५ | तत्पश्चात् पिताको गया हुआ देखकर वे शक्तिपुत्र [पराशर] चन्द्रभूषण शंकरकी पूजा करके प्रिय शब्दोंद्वारा [उनकी] स्तुति करने लगे॥ १०५॥ |
| ततस्तुष्टो महादेवो मन्मथान्थकमर्दनः।<br>अनुगृह्याथ शाक्तेयं तत्रैवान्तरधीयत॥ १०६ | तदनन्तर कामदेव तथा अन्धकका नाश करनेवाले महादेव प्रसन्न हो गये और शक्तिपुत्र पराशरपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १०६॥ |
| गते महेश्वरे साम्बे प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>ददाह राक्षसानां तु कुलं मन्त्रेण मन्त्रवित्॥ १०७ | तब पार्वतीसहित महेश्वरके चले जानेपर मन्त्रवेत्ता पराशर महेश्वरको प्रणाम करके मन्त्रके द्वारा राक्षसोंके कुलको जलाने लगे॥ १०७॥ |
| तदाह पौत्रं धर्मज्ञो वसिष्ठो मुनिभिर्वृतः।<br>अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि॥ १०८<br><br>राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं तथा।<br>मूढानामेव भवति क्रोधो बुद्धिमतां न हि॥ १०९<br><br>हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान्।<br>सञ्चितस्यातिमहता वत्स क्लेशेन मानवैः॥ ११०<br><br>यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः स्मृतः।<br>अलं हि राक्षसैर्दग्धैर्दीनैरनपराधिभिः॥ १११<br><br>सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः। | उस समय मुनियोंसे घिरे हुए धर्मज्ञ वसिष्ठने पौत्र [पराशर]–से कहा—'हे तात! ऐसा महाकोप मत करो; इस क्रोधका त्याग करो। राक्षसोंने अपराध नहीं किया है; तुम्हारे पिताके लिये वैसा ही विहित था। मूर्खोंको ही क्रोध होता है; बुद्धिमानोंको नहीं। हे तात! कौन किसे मारता है; मनुष्य तो अपने किये हुएका फल भोगता है। हे वत्स! क्रोध मनुष्योंके द्वारा अत्यधिक कष्टसे अर्जित किये गये यश तथा तपका नाश करनेवाला कहा गया है। अतः तुम दीन तथा निरपराध राक्षसोंको मत जलाओ और अपने इस यज्ञको बन्द करो; सज्जन लोग तो क्षमाशील होते हैं'॥ १०८-११११/२॥ |
| एवं वसिष्ठवाक्येन शाक्तेयो मुनिपुङ्गवः॥ ११२ | इस प्रकार वसिष्ठकी आज्ञासे तथा उनके वचनोंकी |