श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६५] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २८१
| श्लोक | नाम-सूची |
|---|---|
| निशाचरः प्रेतचारी सर्वदर्शी महेश्वरः।<br>बहु भूतो बहुधनः सर्वसारोऽमृतेश्वरः॥ ७३<br>नृत्यप्रियो नित्यनृत्यो नर्तनः सर्वसाधकः।<br>सकार्मुको महाबाहुर्महाघोरो महातपाः॥ ७४<br>महाशरो महापाशो नित्यो गिरिचरोऽमतः।<br>सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः॥ ७५<br>अमर्षणो मर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशनः।<br>दक्षहा परिचारी च प्रहसो मध्यमस्तथा॥ ७६ | नाद, सर्वावास, चतुष्पथ, निशाचर, प्रेतचारी, सर्वदर्शी, महेश्वर, बहु, भूत, बहुधन, सर्वसार, अमृतेश्वर, नृत्यप्रिय, नित्यनृत्य, नर्तन, सर्वसाधक, सकार्मुक, महाबाहु, महाघोर, महातप, महाशर, महापाश, नित्य, गिरिचर, अमत, सहस्रहस्त, विजय, व्यवसाय, अनिन्दित, अमर्षण, मर्षणात्मा, यज्ञहा, कामनाशन, दक्षहा, परिचारी, प्रहस, मध्यम॥ ७२—७६॥ |
| तेजोऽपहारी बलवान् विदितोऽभ्युदितोऽबहुः।<br>गम्भीरघोषो योगात्मा यज्ञहा कामनाशनः॥ ७७<br>गम्भीररोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः।<br>न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो विश्वकर्मा च विश्वभुक्॥ ७८<br>तीक्ष्णोपायश्च हर्यश्वः सहायः कर्म कालवित्।<br>विष्णुः प्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः॥ ७९<br>हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः।<br>उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवित्॥ ८० | तेज, अपहारी, बलवान्, विदित, अभ्युदित, अबहु, गम्भीरघोष, योगात्मा, यज्ञहा, कामना, अशन, गम्भीररोष, गम्भीर, गम्भीरबलवाहन, न्यग्रोधरूप, न्यग्रोध, विश्वकर्मा, विश्वभुक्, तीक्ष्णोपाय, हर्यश्व, सहाय, कर्म, कालवित्, विष्णु, प्रसादित, यज्ञ, समुद्र, वडवामुख, हुताशनसहाय, प्रशान्तात्मा, हुताशन, उग्रतेज, महातेज, जय, विजय-कालवित्॥ ७७—८०॥ |
| ज्योतिषामयनं सिद्धिः सन्धिविग्रह एव च।<br>खड्गी शङ्खी जटी ज्वाली खचरो द्युचरो बली॥ ८१<br>वैणवी पणवी कालः कालकण्ठः कटङ्कटः।<br>नक्षत्रविग्रहो भावो निभावः सर्वतोमुखः॥ ८२<br>विमोचनस्तु शरणो हिरण्यकवचोद्भवः।<br>मेखला कृतिरूपश्च जलाचारः स्तुतस्तथा॥ ८३<br>वीणी च पणवी ताली नाली कलिकदुस्तथा।<br>सर्वतूर्यनिनादी च सर्वव्याप्यपरिग्रहः॥ ८४ | ज्योतिषामयन, सिद्धि, सन्धि, विग्रह, खड्गी, शंखी, जटी, ज्वाली, खचर, द्युचर, बली, वैणवी, पणवी, काल, कालकण्ठ, कटंकट, नक्षत्रविग्रह, भाव, निभाव, सर्वतोमुख, विमोचन, शरण, हिरण्यकवचोद्भव, मेखला, कृतिरूप, जलाचार, स्तुत, वीणी, पणवी, ताली, नाली कलिकदु, सर्वतूर्यनिनादी, सर्वव्याप्य-परिग्रह॥ ८१—८४॥ |
| व्यालरूपी बिलावासी गुहावासी तरङ्गवित्।<br>वृक्षः श्रीमालकर्मा च सर्वबन्धविमोचनः॥ ८५<br>बन्धनस्तु सुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः।<br>सखा प्रवासो दुर्वापः सर्वसाधुनिषेवितः॥ ८६<br>प्रस्कन्दोऽप्यविभावश्च तुल्यो यज्ञविभागवित्।<br>सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवो मतः॥ ८७<br>हैमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः।<br>आकाशो निर्विरूपश्च विवासा उरगः खगः॥ ८८ | व्यालरूपी, बिलावासी, गुहावासी, तरंगवित्, वृक्ष, श्रीमालकर्मा, सर्वबन्धविमोचन, बन्धन, सुरेन्द्राणां युधि-शत्रुविनाशन, सखा, प्रवास, दुर्वाप, सर्वसाधु-निषेवित, प्रस्कन्द, अविभाव, तुल्य, यज्ञविभागवित्, सर्ववास, सर्वचारी, दुर्वासा, वासव, मत, हैम, हेमकर, यज्ञ, सर्वधारी, धरोत्तम, आकाश, निर्विरूप, विवास, उरग, खग॥ ८५—८८॥ |
| भिक्षुश्च भिक्षुरूपी च रौद्ररूपः सुरूपवान्।<br>वसुरेताः सुवर्चस्वी वसुवेगो महाबलः॥ ८९<br>मनो वेगो निशाचारः सर्वलोकशुभप्रदः।<br>सर्वावासी त्रयीवासी उपदेशकरो धरः॥ ९०<br>मुनिरात्मा मुनिर्लोकः सभाग्यश्च सहस्रभुक्।<br>पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो निशाकरः॥ ९१ | भिक्षु, भिक्षुरूपी, रौद्ररूप, सुरूपवान्, वसुरेता, सुवर्चस्वी, वसुवेग, महाबल, मन, वेग, निशाचार, सर्वलोकशुभप्रद, सर्वावासी, त्रयीवासी, उपदेशकर, धर, मुनि, आत्मा, मुनि, लोक, सभागय, सहस्रभुक्, पक्षी, |