श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ / नाम |
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| सर्वशयः सर्वचारी प्राणेशः प्राणिनां पतिः।<br>देवदेवः सुखोत्सिक्तः सदसत्सर्वरत्नवित्॥ १३०॥<br>कैलासस्थो गुहावासी हिमवद् गिरिसंश्रयः।<br>कुलहारी कुलाकर्ता बहुवित्तो बहुप्रजः॥ १३१॥<br>प्राणेशो बन्धकी वृक्षो नकुलश्चाद्रिकस्तथा।<br>ह्रस्वग्रीवो महाजानुरलोलश्च महौषधिः॥ १३२॥ | क्रूरवासी, तनु, आत्मा, महौषध, सर्वशय, सर्वचारी, प्राणेश, प्राणिनांपति, देवदेव, सुखोत्सिक्त, सत्, असत्, सर्वरत्नवित्, कैलासस्थ, गुहावासी, हिमवद्, गिरिसंश्रय, कुलहारी, कुलाकर्ता, बहुवित्त, बहुप्रज, प्राणेश, बन्धकी, वृक्ष, नकुल, अद्रिक, ह्रस्वग्रीव, महाजानु, अलोल, महौषधि ॥ १२९—१३२ ॥ |
| सिद्धान्तकारी सिद्धार्थश्छन्दो व्याकरणोद्भवः।<br>सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहास्यः सिंहवाहनः॥ १३३॥<br>प्रभावात्मा जगत्कालः कालः कम्पी तरुस्तनुः।<br>सारङ्गो भूतचक्राङ्कः केतुमाली सुवेधकः॥ १३४॥<br>भूतालयो भूतपतिरहोरात्रो मलोऽमलः।<br>वसुभृत्सर्वभूतात्मा निश्चलः सुविदुर्बुधः॥ १३५॥<br>असुहृत्सर्वभूतानां निश्चलश्चलविद् बुधः।<br>अमोघः संयमो हृष्टो भोजनः प्राणधारणः॥ १३६॥ | सिद्धान्तकारी, सिद्धार्थ, छन्द, व्याकरणोद्भव, सिंहनाद, सिंहदंष्ट्र, सिंहास्य, सिंहवाहन, प्रभावात्मा, जगत्काल, काल, कम्पी, तरु, तनु, सारंग, भूतचक्रांक, केतुमाली, सुवेधक, भूतालय, भूतपति, अहोरात्र, मल, अमल, वसुभृत्, सर्वभूतात्मा, निश्चल, सुविद्, बुध, सर्वभूतानामसुहृत्, निश्चल, चलविद्, बुध, अमोघ, संयम, हृष्ट, भोजन, प्राणधारण ॥ १३३—१३६ ॥ |
| धृतिमान् मतिमांस्त्र्यक्षः सुकृतस्तु युधांपतिः।<br>गोपालो गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः॥ १३७॥<br>हिरण्यबाहुश्च तथा गुहावासः प्रवेशनः।<br>महामना महाकामो चित्तकामो जितेन्द्रियः॥ १३८॥<br>गान्धारश्च सुरापश्च तापकर्मरतो हितः।<br>महाभूतो भूतवृतो ह्यप्सरो गणसेवितः॥ १३९॥<br>महाकेतुर्धराधाता नैकतानरतः स्वरः।<br>अवेदनीय आवेद्यः सर्वगश्च सुखावहः॥ १४०॥ | धृतिमान्, मतिमान्, त्र्यक्ष, सुकृत, युधांपति, गोपाल, गोपति, ग्राम, गोचर्मवसन, हर, हिरण्यबाहु, गुहावास, प्रवेशन, महामना, महाकाम, चित्तकाम, जितेन्द्रिय, गान्धार, सुराप, तापकर्मरत, हित, महाभूत, भूतवृत, अप्सर, गणसेवित, महाकेतु, धराधाता, नैकतानरत, स्वर, अवेदनीय, आवेद्य, सर्वग, सुखावह ॥ १३७—१४० ॥ |
| तारणश्चरणो धाता परिधा परिपूजितः।<br>संयोगी वर्धनो वृद्धो गणिकोऽथ गणाधिपः॥ १४१॥<br>नित्यो धाता सहायश्च देवासुरपतिः पतिः।<br>युक्तश्च युक्तबाहुश्च सुदेवोऽपि सुपर्वणः॥ १४२॥<br>आषाढश्च सुषाढश्च स्कन्धदो हरितो हरः।<br>वपुरावर्तमानोऽन्यो वपुःश्रेष्ठो महावपुः॥ १४३॥<br>शिरो विमर्शनः सर्वलक्ष्यलक्षणभूषितः।<br>अक्षयो रथगीतश्च सर्वभोगी महाबलः॥ १४४॥ | तारण, चरण, धाता, परिधा, परिपूजित, संयोगी, वर्धन, वृद्ध, गणिक, गणाधिप, नित्य, धाता, सहाय, देवासुरपति, पति, युक्त, युक्तबाहु, सुदेव, सुपर्वण, आषाढ़, सुषाढ़, स्कन्धद, हरित, हर, वपु, आवर्तमान, अन्य, वपुश्रेष्ठ, महावपु, शिर, विमर्शन, सर्वलक्ष्य-लक्षण-भूषित, अक्षय, रथगीत, सर्वभोगी, महाबल ॥ १४१—१४४ ॥ |
| साम्नायोऽथ महाम्नायस्तीर्थदेवो महायशाः।<br>निर्जीवो जीवनो मन्त्रः सुभगो बहुकर्कशः॥ १४५॥<br>रत्नभूतोऽथ रत्नाङ्गो महार्णवनिपातवित्।<br>मूलं विशालो ह्यमृतं व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः॥ १४६॥<br>आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महातपाः।<br>महाकण्ठो महायोगी युगो युगकरो हरिः॥ १४७॥<br>युगरूपो महारूपो वहनो गहनो नगः।<br>न्यायो निर्वापणोऽपादः पण्डितो ह्यचलोपमः॥ १४८॥ | साम्नाय, महाम्नाय, तीर्थदेव, महायश, निर्जीव, जीवन, मन्त्र, सुभग, बहुकर्कश, रत्नभूत, रत्नांग, महार्णवनिपातवित्, मूल, विशाल, अमृत, व्यक्ताव्यक्त, तपोनिधि, आरोहण, अधिरोह, शीलधारी, महातप, महाकण्ठ, महायोगी, युग, युगकर, हरि, युगरूप, महारूप, वहन, गहन, नग, न्याय, निर्वापण, अपाद, पण्डित, अचलोपम ॥ १४५—१४८ ॥ |